शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

पर्व को लेकर लोगों का दो मत होना

पर्व को लेकर लोगों का दो मत होना.

आजकल लोग पर्व को लेकर काफी उलझन में रहते है यह पर्व हमारा है वह पर्व हमारे परम्परा में नहीं है, वास्तव में पर्व को इंसानो ने अपने सहूलियत के साथ अपनाये व परम्परा में तब्दील हो गई। भारतीय संस्कृति में अभी पर्व नवदुर्गा से शुरुआत होकर तुलसी पूजा में जाकर रुकेगी। 

मैंने कुछ लोगों का विचार पढ़ा कह रहे है हमारे यहाँ का पर्व करवाचौथ नही है, मैं भी मानता हूं हमारा नही है पर जो मना रहे है व अपने दायरे में रह कर मना रहे है ऐसे में हमें आपत्ति नही होनी चाहिए, क्योंकि चांद तो किसी का नही है वो तो सनातन का है अर्थात जब से ब्रम्हांड का उदय हुआ है तब से चाँद हमारे लिए मूल्यवान है, ऐसे में करवाचौथ के पूजन से क्या छत्तीसगढ़ के सकट पर प्रश्न या संकट खड़ा हो जायेगा ?  तो नहीं, दोनों भारतीय संस्कृति का परम्परिक क्षेत्रीय पर्व है, जो भारतीय संस्कृति को प्रकट करती है न कि किसी को नीचा दिखाने का। 

छत्तीसगढ़ में दुर्गा पूजा में जसगीत का अनोखा महत्व है, इसके शुरुआत से आप समझ जाइये कि त्योहारों का मौसम आने वाला है, एक लेखक ने ठंडा का जिक्र किया था कि जैसे ही ठंड की महसूस होती है भारतीय संस्कृति का पर्व साफ नजर आने लगती है। जब कहि डांडिया-गरबा होता है तब कुछ लोगो का कमेंट घिनौनी होती है, अरे आपको कौन अधिकार दिया है किसे गरबा नृत्य करना चाहिए किसे नही, माता की आराधना करने में कोई बुराई नही होना चाहिए, गरबा गुजरात से आया है इसका मतलब यह नही की हम गरबा का अपमान कर दें, गरबा भारतीय संस्कृति का हिस्सा है मना नही सकते तो अपमान भी न करे। 

छत्तीसगढ़ में कार्तिक मास में सुबह-सुबह पूरे कार्तिक महीने में पानी मे डुबकी लगाकर, दीपदान करने का रिवाज है जिसमें दिये सूखे कदु या लौकी के होते है इसे आस्था कहे या भारतीय संस्कृति का हिस्सा यह हमारे लिए अनमोल है। वही सुआ नृत्य की परम्परा है, दिवाली के शुरुआत में सुआ नृत्य करना अर्थात स्त्री शाम में घर-घर जाकर सुआ अर्थात तोता के चारों तरफ नृत्य करती है और सुआ गीत गाकर स्त्री अपने प्रेम को प्रकट करती है। 

वही बिहार में छठ पूजा का महत्व बेहद है तो इसे हमें कोई तकलीफ नही होनी चाहिए, वे लोग हम सब पर अपनी परम्परा नही थोप रहे है, हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए, भारतीय संस्कृति विविधता में एकता का सन्देश देता है, और खण्ड खण्ड से मिलकर बना देश है ऐसे में दूसरों की संस्कृति को बुरा कहने से बचे कोई राय बनाने से बचे आस्था का पर्व प्रेम पूर्वक मनाये, अपनी अपनी संस्कृति है जिसे हम जिंदा रखने का प्रयास कर रहे है, स्वतंत्र भारत मे भारतीय संस्कृति का आदर भाव करिये।।

~अमित चन्द्रवंशी "सुपा"


रविवार, 13 सितंबर 2020

हिंदी एक भाषा ही नही परन्तु एक विचार है

हिंदी एक भाषा ही नही परंतु एक विचार है, जनमानस का क्रांति का साधन है। 


हिंदी हिन्द का धड़कन है यह सभी जानते है, वही अगर बात की जाये तो हिंदी का जन्म संस्कृत से हुआ है या यूं कहें हिंदी संस्कृत का एक रूप है, हिंदी हिंदू आर्य के शाब्दिक व्यवहार को प्रदर्शित करते थे जो जनमानस को आपस में जोड़कर रखती है, आज करोड़ो दिलों की मातृभाषा बन गई है, बचपन मे पहला शब्द हिंदी करोड़ो लोग सुनकर बड़े होते है । हिंदी एक न्याय प्रिय भाषा है वही मिठास से भरा हुआ पिटारा भी है।

आजादी की लड़ाई का जब जब जिक्र होगा, हिंदी कभी अछूता नही रहेगा, हिंदी का वैभव आज से नही या फिर आजादी की लड़ाई से नही आदिकाल से जनमानस की भाषा रही है। सभ्यता का उदय हुआ तब से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है, एकाएक कोई भाषा समृद्ध नही होती है, उसे प्रकृति, लोककला, लोकसंस्कृति, लोक जीवन, रहनसहन, व भाषा शैली आदि से भाषा बनती है। 

प्रकृति के मूलतत्व जीवन का हिस्सा होती है, हम प्रकृति से हँसना, बोलना, रोना, सोना, खाना, पीना व शान्ति आदि सीखते है। वही से भाषा या बोली का जन्म होता है, प्रकृति की चंचलता ही जीवन को अनमोल बनाती है, वैसे ही भाषा को काव्य, संस्कृति, रहनसहन, पहनावा, कला व खानपान आदि भाषा को रहस्यों की गुत्थी सुलझाती है। जीवन मे हम किस परिवेश में रहते है, देशकाल की सीमा, भूगोल, बोली व वेशभूषा बदल देती है साथ ही खानपान व संस्कृति। 

भाषा एक दिन में नही बनती है यह सच है, लेकिन एक के बोलने से या पढ़ने से भाषा जरूर समृद्ध होती है, हिंदी ममतामयी भाषा है, बोलचाल की भाषा मे प्यार व अपनापन का छाप झलकता है। सदियों लग जाती है भाषा का गहरा छाप छोड़ने में, आजादी के समय ही हिंदी भाषा ने मानव के चेतना को समृद्ध किया, परचे में कहानी, कविता, नाटक व एकांकी आदि लिखकर हिंदुस्तान की जनता को देश के प्रति जागरूक किये व स्वंतत्रता की लड़ाई में साथ देने लाखों लोग साथ खड़े हुए, भाषा का कमाल ही है जो भारत की जनमानस को एक कर पाई, साहित्य ने आजादी में एक बड़ी भूमिका निभाई है।

दुनिया में सात भाषा में वेब एड्रेस बनता है उसमें से एक हिंदी है, किताबी दुनिया से खत्म होकर हिंदी जुबान पर आ गई है साथ ही डिजिटल दुनिया में भी। हिंदी का दबदबा आज भी कायम है पहले  से अधिक लोग बोलने लगे है, क्योकि हिंदी भाषा संस्कृति व संस्कार की भाषा है, जो विकास का भुवन लिखते नजर आती है, राष्ट्र को एक बनाती है, गूगल ने भी हिंदी की महत्व को समझा व लिखने में आसान भी कर दिया।

1953 से 14सितंबर को हिंदी दिवस भारत मे मनाया जाता है, हिंदी केवल भाषा नही है अपितु जनमानस की अस्मिता, गौरव व स्वभिमान की भाषा है। हिंदी भारत की सीमा में कैद नही हुई विदेशों में भी आज पढ़ाई होने लगी है लोग बोलने लगे है। भारत भूमि को हिंदी बहुत सुंदर व समृद्ध बनाती है, विभिन्न बोली व भाषाओं वाले देश में एकता का परिचायक है। 


-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

उदय और अस्त इंसान के हाथ में है

उदय और अस्त इंसान के हाथ में है

दुनिया के तमाम देश के डॉक्टर नावेल कोरोना वायरस के दवा या वैक्सीन बनाने में लगे हुए है, मानवीय सभ्यता का उदय के बाद यह एक पहली लड़ाई जो सभी देश अपने घर मे खुद से खुद लड़ रही है। सभ्यता का उदय और अस्त मानव के हाथ मे हमेशा से रहा है, उसके पीछे सारी दुनिया है। मानव ने विकास के अनेक परिभाषा दिये लेकिन सभी विकास की रूपरेखा अलग अलग है समय के साथ विकास में फेरबदल हुआ। 

आज सभी सम्पन्न, विकसित और विकासशील देश नावेल कोरोना वायरस से झुंझ रहा है, ज्यादातर देश हाथ खड़ा कर दिया है, विश्व महामारी में देश की सीमा देखना उचित नही होगा, इतिहास से हमे बहुत कुछ सीखने को मिला है ऐसे में इतिहास को साक्षी मनाकर हमे आज अपने घर को पहले देखने की जरूरत है, अगर हम सक्षम है तो दुनिया को रास्ता दिखा सकते है। सरकार के काम पर हस्तक्षेप न करते हुए उनके साथ खड़े होने की जरूरत है। 

विश्व मंदी कि ओर बढ़ रहा है वही महामारी ने लाखों लोगों की जान ले ली है वही मरीजो की संख्या कम होने के बजाए आय दिन बढ़ रही है। विश्व मंदी 1929 में अमेरिका के स्टॉक मार्केट क्राइसिस से शुरुआत हुई और उस समय मृत्युदर अवसाद से बढ़ी, विश्व आर्थिक मंदी का लंबे दौर तक रहा द्वितीय विश्व युद्ध के समय लाइन में आया। अवसाद से मृत्युदर बढ़ी, जीने के लिए आज लोगो को मेन्टल स्ट्रेंग्थ पर काम करने की जरूरत है, रोग प्रतिशोधक क्षमता बढ़ाये जाने से लड़ सकते है। धैर्य, साहस, सौम्यता, विज्ञान, एकजुटता, विज्ञान व अनुभव आदि से लड़ने की जरूरत है।

आज भारत की स्थिति USA और यूरोपीय देशों से बेहतर है, कोरोना ग्रोथ चार्ज कम हुई। हेल्थ इंस्ट्राफ्रैक्चर हमारी बेहतर है, कोरोना राइजिंग कर्व को नीचे लाने के लिए ट्रीटमेंट अच्छा हो, वायरस हमेशा से एक कदम आगे होता है, ऐसे में कोई भी देश पहले से तैयार नही होता है लेकिन भारत सभी चीजों से लड़ने के लिए तैयार खड़ा था इसी के बदौलत हम आज इतने दिन तक टिक पाये, कोरोना का कहर आग की तरह बरपा है जिसे निकलने में वक़्त लगेगा।

कम संसधान में युद्ध लड़ना आसान नही होता है लेकिन मुस्किल भी नही, वैचारिक दृष्टि से हमे आपस मे सामंजस्य स्थापित करने की जरूरत है, घरों में रहना आसान नही है लेकिन आज चैन को तोड़ने के लिए घरों में रहना और नियमित दिनचर्या में जीवनयापन करने की आवश्यकता है, इमरजेंसी होने पर ही घर से बाहर निकलना चाहिए नही तो जीतने समान है उसी में सर्वाइव करने की जरूरत है, हम जीवन के उस पड़ाव में है जहाँ मौत को हम खुद बुलाएंगे, ऐसे में कोरोना से लड़ने के लिए एक साथ खड़े होने की जरूरत है।

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

सुर्खियों के चक्कर मे तैर रही थी लाश : टाइटैनिक

सुर्खियों के चक्कर में तैर रही थी लाश : टाइटैनिक 

मानवीय सभ्यता का विकास का यह दौर इतिहास में हमेशा याद किया जायेगा, 1912 में जो घटना समुद्र में घटी उसके लिए किसी एक को दोष देने से अच्छा है सुर्खियों में रहने वाली जहाज को दोष देना उचित है। कभी न डूबने वाली इतिहास का भाप से चलने वाला उस वक़्त का सबसे बड़ा जहाज टाइटेनिक अपने पहली सफर साउथम्पटन से न्यूयॉर्क जाते वक्त ही जल के तल में समा गई। इतिहास का वह काला दिन सभी के जहन में आज भी जिंदा है। "समुद्र का दिल" हीरा समुंदर की लहरों में खो गई, विरासत में टाइटेनिक के मलबे के सिवाय कुछ मिला तो वह उस दिन प्रेस वालो को सुर्खियों का खजाना, प्रथम पृष्ठ में बड़े बड़े अक्षरों में कभी न डूबने वाली जहाज का भयानक अंत, खौपनाक मंजर जिसे दिल सुनकर कांप जाये। 20वी सदी की सबसे बड़ी समुद्री आपदा जिसे याद कर रूहे कांप जाती है, वह मंजर कभी देखने को न मिले। भाप से चलने वाली उस समय की सबसे बड़ी जहाज, कभी न डूबने वाली हमेशा सुर्खियों में रही, अपनी यात्रा 10 अप्रैल 1912 के चार दिन बाद 14 अप्रैल 1912 जल समाधि बन गई। बर्फ की चट्टान मिलने के बाद भी तेज रफ्तार से दौड़ रही थी, वक़्त रहते मोड़ने का अनुमान, एक कीर्तिमान स्थापित करने के लिए, एक बार मे समय के पहिया को समेटना चाहते थे, दूरियां को चंद घण्टे पहले तय करने की जिद्द 1517 निर्दोष को साथ मे लेकर टाइटैनिक डूब गई, इतिहास का सबसे बड़ी दुखद घटना में से एक है जब इतने लोग समुन्दर की लहरों में खो गये, किसी का ऐतेबार नही किया। रेडर भी काम नही आया और तो और उस जमाने के नामचीन इंजीनियर, एक्सपर्ट और डिज़ाइनर आदि की  कीमित देन अपनी पहली यात्रा के दौरान ही अपनी अंतिम यात्रा किया जिसका जिक्र हमेशा होगा, 4चिमनी प्रभावशाली रूप देने के लिए लगाए गए थे जिसमें तीन ही काम करता था। प्रेस के लिए सुर्खियों में हमेशा रही। 1500 लोग के साथ टाइटेनिक दफन हो गई, जब टाइटेनिक डूबी उस वक़्त 6 लोगो को बाद में सभी नावों को आपस मे जोड़कर रक्षा दल आई तब बचाये उस ठंडे पानी मे महज 20मिनट तैरना मुश्किल था पानी बहुत ज्यादा ठंडा था, बच पाना नामुमकिन था। नाव में 700 लोगो को सिर्फ इंतजार करना था, अपने मुक्ति के लिए जो उन्हें कभी न मिली, अपने आंखों के सामने समुन्दर में समाते हुए लोगो का दर्द दफन हो गई। टाइटैनिक कीमतें चीजों से बना था, उस जमाने के सारे विशेषज्ञों के राय एक जहाज बनाने के लिए जो जरूरत होता है उन्नत तकनीक का उपयोग किया गया था, वह सभी चीजें जरूरत के चीजे शामिल किया गया था। ये आपदा मानवीय संवेदना की याद हमेशा दिलाएगी, यह समुद्री आपदा ही नही बल्कि समय का चक्रव्यूह था जो काल बनकर आया था जो कभी न डूबने वाली टाइटेनिक को पहले सफर में ही ले डूबी। इतिहास में इसका जिक्र बहुत है लेकिन औरत के जज्बात समुन्दर की गहराई के सामने है, टाइटेनिक को समझना आसान नही है इसे महसूस कर सकते है, बहुत रिसर्च हुआ और होता रहा है इतिहास में इसे झुठलाया नही जा सका, समय के पहिया में टाइटेनिक हमेशा के लिए कैद हो गया है, हार्ट ऑफ ओसियन समुन्दर की लहरों में खो गई, हार्ट ऑफ ओसियन को पाने की इच्छा रखने वाले वैज्ञानिको ने बहुत खोज किया लेकिन रॉस महिला यात्री जिसके मंगेतर के जैकेट में होता है उनके हाथ लग जाता है वह अपने उम्र के अंत समय में एक रीसर्च के दौरान समुन्दर के लहरों में जहाँ टाइटेनिक डूबा रहता है वहाँ फेंक देती है समुद्र की लहरे उसे अपने आप मे आगोश लेती है। प्रेस के सुर्खियों में हमेशा के लिए छाप छोड़कर गया और इतिहास का भयानक आपदा मानवीय जीवन का एक मौत भरी रात रही थी समुन्दर की गहराई में सभी चीज समा गया। सुर्खियों में रहने वाला टाइटैनिक जीवन मे जहाजों का सफर का एक असवाल पैदा करने वाला पल रहा है, सभी विशेषज्ञों की विचारों को मात दे गई, एक गलती समय को कैद करने की विशाल जहाज को लेकर डूब गई। नौका दल कम थी लोगो को बचाना मुस्किल था कोई दूसरी जहाज घण्टो दूर थी ऐसे में जो बचे थे उनको मौत से कोई नही रोक सकती थी 6 लोग जो बचे वह ठंडे पानी मे टीके रहे जब नौका बचाव दल आई बाकी सभी लाश बनकर तैर रही थी, इतिहास को कैद करने वाला समय, विरासत में विशाल टाइटैनिक का मलबा और साथ मे बहुत से लोगो को अंत की कहानी के सिवाए कुछ नही मिला। 

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"

गुरुवार, 12 मार्च 2020

कोरोना से लड़ रहा है विश्व

कोरोना से लड़ रहा है विश्व


यह वायरस चीन के वूहान शहर से शुरु हुआ जो आज विश्व की समस्या बन गई। चीन हमेशा से सुर्खियों में रहना चाहता रहा है और समय समय पर रहता भी है, आज चमगादड़ के रस से दुनिया मे छा गया है। कोरोना वायरस सपने की तरह आया जो सभी को झकझोर दिया, यह आग की तरह फैला वही चीन में लगभग 5 करोड़ लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो गया है, यह आग की तरह फैल गया विकासशील देशों को तो छोड़ा नही वही विकसित देशों की सीमा भी लांघ गया। 


विकासशील देश मे सुमार चीन भूल गया क्या करना चाहिए क्या नही, अपने सपनो पर पानी फेर दिया। मौत के दरवाजे पर अबतक लगभग विश्व मे 90000 लोग खड़े है, वायरस जहर की तरह शरीर मे फैल गया, वही यह आंकड़ा दहलीज पर कर रहा है। लोग लड़ रहे है अपने स्वभिमान से, वायरस का फैलना अपने आप मे भयंकर मंजर है जो कभी किसी ने देखा था न देखा रहा है।


ईरान में मृत्यु दर बढ़ रही है वही चीन में तो मृत्यु दर तेजी से बढ़ी, मृत्युदर में देखा गया वृद्धावस्था में जो लोग है उनकी मृत्युदर देखा गया, युवा अवस्था मे इम्युनिटी अत्यधिक होती है जिसे प्रभावित कम हुई वही वृद्ध में कोरोना का कहर बरपा है, महिलाओं में यह कम है, तापमान का प्रभाव लोगो मे पड़ा और कोरोना करोड़ो लोगो को आग की तरह संकट में डाल दिया लाखो लोग इसे शिकार हुए वही भारत को भी छू लिया तकरीबन 50-60 लोग संदिग्ध पाये गये, कोरोना वायरस को  Covid19 दिया गया। मानवीय आपदाओं का वह मंजर है जो इतिहास में कभी नही हुआ था खूनी खेल लोग मौत के दरवाजे पर खड़े है, जीवन और मौत से लड़ रहे है।


इसे बचने के लिए सेनेटाइजर व मास्क का उपयोग करे। हाथ को साबुन या एल्कोहल से धोया, छीकते वक्त कपड़े का उपयोग करे, संक्रमित होने से बचे, निमोनिया होने पर प्राथमिक उपचार तुरंत ले और साथ ही अपने आप को किसी भी बीमारी से बचाकर रखे। मानवीय संवेदनाओं को ध्यान रखते हुए किसी की मौत न हो उसके लिए दुआ के सिवाये कुछ नही बचा है क्योंकि दुनिया मे कोरोना से बचने के उपाय अबतक ढूंढ नही पाये है ऐसे में अब भगवान से ही उम्मीद है कि वह सब अच्छा करे हम सिर्फ अपने आपको इम्यून कर सकते है हमारी इम्यून सिस्टम को मजबूत कर सकते है। आयुर्वेद के नियमों का पालन करके हम अपने आप को बचा सकते है, अपने इम्यून सिस्टम को बढ़ा सकते है। तुलसी, लौंग, अदरक तथा जड़ी बूटियां आदि का सेवन करे व हरे सब्जियों का उपयोग करे।


कोरोना वायरस सीधे लफ्जो में कहो तो समय से पहले मौत है, यह एक ऐसे समय मे आया जब विश्व विकास की नई परिभाषा और मौत को मात देने में लगी हुई है। मानव सभ्यता का विकास पर्यावरण पर अधिकार स्थापित करने के लिए हमेशा से रहा है जो आज संतुलन बनाये जाने की आवश्यकता है तब जाकर हम कोरोना जैसे वायरस से लड़ सकते है। वैसा काम ही न करे कि भयानक मंजर आये, लोगो को सामंजस्य स्थापित करने की जरूरत है, जहाँ कोरोना फैल रहा है वहाँ धैर्य की जरुरत है और अपने आप को संक्रमित होने से बचाने की, दुआ के सिवाये लोगो के पास कोई रास्ता नही है ऐसा मानना है, लोगो के जज्बात समन्दर की तरह गहरे है लेकिन आज कोरोना वायरस का भयानक मंजर देख पाना मुश्किल।।


-अमित चन्द्रवंशी "सुपा" 

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

वकालत से राजनीति की गलियारों में सुषमा स्वराज जी

वकालत से राजनीति की गलियारों में सुषमा स्वराज जी

सुषमा स्वराज जी का निधन देश के लिए अपूर्ण क्षति है, पक्ष और विपक्ष की भूमिका सादगी से निभाई, भारतीय राजनीति के लिए अपूर्ण क्षति है जिसे हम कभी भर नही सकते। प्रखर वक्ता, महान नेत्री जी का जाना राजनीतिक गलियारों में वेदना का समय है। सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में वकालत करते, हरियाणा से विधायक 25वर्ष की उम्र में बना, फिर दिल्ली की प्रथम महिला मुख्यमंत्री बनकर, महिला सशक्तिकरण का उदाहरण पेश की। भारत की पहली महिला विदेश मंत्री बनी और पूरे विश्व मे भारत की एकता अखंडता का गुणगान किया। लोकसभा और राजसभा सांसद बनकर भारतीय राजनीति में सक्रिय रही, पक्ष और विपक्ष दोनों को भूमिका बखूबी निभाई, हमेशा धैर्य रखने की बात कहती, और विचारों में अमल करते हुए, सादगी से प्रश्न का जवाब देती थी। एक बार इन्होंने यह भी ट्वीट किया था कि यदि आप मंगल में भी फंसे है तो आपका मदद इंडियन एम्बेसी करेगी, सम्पूर्ण जीवन मे सरलतापूर्वक रही। 25 वर्ष की उम्र में कैबिनेट मंत्री हरियाणा के रूप में सेवा देते हुए विदेश मंत्री बने का सफर, विपक्ष में रहते हुए दिलेर इंसान बना, पक्ष में जब एक लोकसभा में भाषण दे रही थी तक आरोप प्रत्यारोप लगे तब सुषमा जी ने साफ कहा अपने साथियों को आप लोग साथ रहे मैं इनसे (विपक्षी) से निपट लुंगी, वास्तव में एक दृण इच्छा शक्ति उनमें थी, साफ राजनीति, सीधी सरल रूप में थी। सुषमा जी का अलग अलग शैली में भाषण हमेशा याद आएगी। यूनाइटेड नेशंस में जलवायु परिवर्तन पर विचार रखी और विदेश नीति में बहुत अच्छा काम किया, सुषमा जी का विदेश निति देखते हुये बनता था, नेपाल में आपदा आई तो सबसे पहले भारत पहुँचा यह सुषमा जी की सादगी थी, इंडोनेशिया की मदद के लिए यूनाइटेड नेशंस में ही बात रखी थी। इस लोक से सुषमा जी का पलायन कर जाना हमेशा खलेगी, नमन है ऐसी मातृ शक्ति को जो हमेशा देश के बारे में सोचती रही।

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"

शनिवार, 3 अगस्त 2019

दोस्ती की दोस्ताना

दोस्ती की दोस्ताना

उम्र के हर पड़ाव में एक साथी की जरूरत पड़ती है, वह किसी भी रूप में हो सकता है बचपन मे माँ दोस्त का रूप लेती है और खाने से लेकर सब काम करती है। दोस्ती का दूसरा रूप जो उँगली पकड़कर चलना सिखाते है दुनिया से रूबरू कराते है वह पिता होता है, उम्र के हर दहलीज पर कोई न कोई एक इंसान होता है जो दोस्त जैसा होता है और हर उम्र में हर मोड़ में हमारा साथ देते है। बचपन मे दोस्त बहुत होते है जिनके साथ हमारी खट्टी मीठी यादे होती है, बचपन मे साथ बिताये पल वह अनोखी यादे होती है जो जहन में हमेशा होती है, साथ खेलते है, रोते हँसते समय बीत जाता है, बड़े होते है तब वह बचपन याद आता है। समय के सागर में विश्व में हम अलग अलग समय मे अलग अलग विचार वाले लोगो से मिलते है, जीवन मे अनेक अनुभव मिलते है जो सदा सुख के हित में होता है। सात्विक जीवन ऊंच विचार दोस्ती की याद दिलाती है, दोस्ती एक रिश्ता ही तो है जो विश्वास के नींव में टिकी हुई होती है, उम्र जैसे जैसे बढ़ती है हम एक नया अध्याय लिखते है जो विचारों का आदान प्रदान से होती है, समय के साथ विचारों में बदलाव आती है, विचार से रिश्ता मजबूत होता है। एक प्रेमी के लिए प्रेयसी का प्रेम का महत्व होता है वह दोस्त के तरह सादगी से जीवन निर्वाह करता है। एक माता के लिये सन्तान और उसका पति ही दोस्त होता है, जो सुख दुख का साथी होता है। एक पत्नी के लिए उसके पति से अच्छा कोई दोस्त नही हो सकता है, सभी को किसी न किसी उम्र में दोस्त की आवश्यकता होती है वह विभिन्न रूप में मिलते है। एक बेटी किसी की माँ, बहन, पत्नी और पुत्री होती है उसी तरह एक बेटा किसी का पुत्र, पिता, पति और भाई होता है, इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए वह जीवन के सभी कर्तव्यों को ध्यान में रखता है और अपना परिचय एक दोस्त के रूप में देता है और दुनिया में अपनी दोस्ती का दोस्ताना सुनाती है। बुजुर्ग होने पर एक पिता व एक माँ का दोस्त बेटा और बहु बन जाते है, यही तो दोस्ती की सार है जो हर हाल में हमे जीना सिखाती है।दोस्त की तुलना हम किसी से नही कर सकते है वह जिस भी हाल में हो हमेशा सुख चाहता रहता है जीवन मे अलग अलग रास्ते से गुजरना पड़ता है सत्य के लिए हमेशा अड़िग होना पड़ता है, सत्य के आधार पर दोस्ती चलती है।

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"
साइंस कॉलेज दुर्ग