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बुधवार, 2 दिसंबर 2020

किसान आंदोलन का जड़

यह आक्रोश अन्नदाता का है, सरकार को अन्नदाता की बात सुनी चाहिए...

किसान आंदोलन सरकार के किसान बिल के विरुद्ध है, लेकिन सरकार अबतक बिल को समझाने में नाकाम क्यों रही? इस पर विचार विमर्श करने की जरूरत है, आखिर आज इतनी बड़ी संख्या में किसान दिल्ली में क्यो आकर बैठ गई क्या सरकार विज्ञापन के माध्यम किसान बिल को समझा नही पाया या किसान समझने की कोशिश ही नही किये ये दोनों अलग मुद्दे नही, किसान बिल से जुड़े हुए है। 

1857 में बगावत का दौर था या कहे कम्पनी शासन के प्रति आक्रोष, प्रथम स्वंतत्रता संग्राम के समय भारतीय जनमानस भुखमरी से जुंझ रहा था वही किसानी भूमि हस्तांतरण हो रहा था एक ओर निम्न किसान व मजदूरों की हालात दयनीय थी वही विद्रोह का सूत्रपात हुआ, बाहरी घटनाओं का भी प्रभाव पड़ा।

आजादी के बाद 1967 में भारत भुखमरी से गुजर रहा था, तब पश्चिमी गुट के भरोसे भारत था, और उस वक़्त अमेरिका गेंहू देने से मना कर दिया तब भारत के किसान ने हार नही मानी और अथक प्रयास व परिश्रम से आज हम खाद्यपदार्थ पर स्वयं के पैरों पर खड़े है। किसान कभी भी खेती नही कर सकता है क्योंकि कभी मानसून के न आने का दुःख किसान से अच्छा कोई नही समझ सकता है। 1987 में भीषण आकाल ने लोगों को क्रोधित कर दिया वही, किसान संघठन एकजुट हुए और उनकी मांग थी कृषि उपज के लिये ऊंची कीमत व सब्सिडी मिले, यह मांग वास्तव में जायज थी, आज भी उचित मूल्य पर ही बात हो रही है और मांगे जायज है।

किसान दिनरात मेहनत करते है, लेकिन कभी मानसून का मार कभी बिजली आपूर्ति के चलते फसल बर्बाद हो जाता है, और ऐसे वक्त में किसान का दुःख कोई नही समझता है। आज किसान दिल्ली में धरना दे रहा है, क्योंकि किसान नाराज है, और लोकतांत्रिक देश मे यह आम बात है जनता द्वारा चुना गया सरकार जनता की बात नही सुनेगा तो कौन सुनेगा? प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रश्न खड़ा हो रहा है, क्या प्रेस किसान बिल को नही समझा पा रहा है या सरकार का बिल गलत है? यह दोनों मुद्दे आज गम्भीर है। किसानों के ऊपर आश्रु गैस छोड़ना है या पानी का कैन डालना गलत है शांति से अपनी बात सरकार को रख रहे है ऐसे में किसान अपराधी कब से हो गए? यह दूसरे आंदोलन की तरह पेट की बात है साहब, विचार मंथन व एक दूसरे से बात करने पर समस्या का हल होगा।

किसान आंदोलन में राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगी हुई है यह सभी आंदोलन में होता रहा है कोई नई बात नही है, लेकिन वही जब इंदिरा को ठोके है मोदी क्या चीज है, यह बहुत ही घटिया है, अशोभनीय है, खालिस्तानी विचारधारा जरनैल सिंह भिंडरावाले का फोटो लेकर आंदोलन में आना बहुत ही निंदनीय है, इसे मुद्दे पर यह भार कम पड़ेगा, इस तरह से पूरे किसानो समुदाय को खालिस्तान व पाकिस्तानी सोच कहना बहुत ही अशोभनीय है। 

किसानों की बात सरकार को सुनाना चाहिए, जितना जल्दी हो एक दूसरे के समझ व सोच बुझ  के हिसाब से सरकार व किसानों का आपसी सहमति से काम करने का समय है। किसानों का हक मिलना चाहिए, और msp को कानूनी मंजूरी देते हुए, किसानों का पूरी अनाज सरकार को उचित मूल्य में लेना चाहिए। 

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"

शनिवार, 28 नवंबर 2020

भाषायी पुर्नगठन पर छत्तीसगढ़ी

स्वतंत्रता के पूर्व भारतीय राज्य क्षेत्र में बंटा हुआ था ब्रिटिश भारत व देशी रियासतों। छत्तीसगढ़ विंध्याचल में आता था उस वक़्त, वर्तमान मध्यप्रदेश, अब वास्तविक स्वरूप में छत्तीसगढ़। छत्तीसगढ़ की बात कि जाए तो हम भाषायी रूप से अलग नही विकास के नाम पर बस्तर व सरगुजा को ध्यान में रखते हुए विविधता से भरा हुआ छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश से अलग हुआ। 

छत्तीसगढ़ के हिस्से में अनेक बोलियां व राजभाषा छत्तीसगढ़ी मिला जो हमारे लिए एक तौफा है, क्योंकि कुछ राज्यों की अपनी भाषा ही नही है, सिर्फ बोली है। छत्तीसगढ़ी व हिंदी देवनागरी लिपि में पढ़ी व बोली जाती है, और त्रिभाषायी हिंदी, अंग्रेजी व क्षेत्रीय भाषा का महत्व अपनी राजभाषा से समझ आती है। 

हमारी राजभाषा छत्तीसगढ़ी है, भले ही राजभाषा में जुड़ा न हो या आठवीं अनुसूची में शामिल न किया गया हो, फिर भी विधायिक छत्तीसगढ़ी का चुनाव करती है। छत्तीसगढ़ी से बस छत्तीसगढ़ अलग हो नही सकता था क्योंकि हल्बी, सरगुजिया व गोंडी भी हमारी अपनी है, ऐसे में छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी पर आज जोर दिया जा रहा है। 

छत्तीसगढ़ी की शब्दकोश बहुत पहले बन चुका था तकरीबन 1890 के दशक में, बाद में साहित्य पर ध्यान नही दिया गया व बोलचाल में थोड़ा परिवर्तन के कारण छत्तीसगढ़ी समृद्ध नही हुई जितना होना चाहिए, लेकिन आज साहित्य भी भरपूर मात्रा में, छत्तीसगढ़ी अनुवाद भी बहुत से है, कला परम्परा में साफ झलकता है, फ़िल्म में भी कमी नही, प्रशासनिक गलियारे भी अब पीछे नही है। 

छत्तीसगढ़ी का जन्म कब व कैसे हुआ इसका किसी को शायद जानकारी नही है, फिर भी कहा जाता है संस्कृत से हिंदी का जन्म हुआ और 10वी शताब्दी में हिंदी से छत्तीसगढ़ी, इसमें कोई दो मत नही है, छत्तीसगढ़ी आज अपने आप मे समृद्ध व शक्तिशाली है। 

अनुच्छेद 345 में छत्तीसगढ़ी को क्षेत्रीय भाषा का दर्जा है, छत्तीसगढ़ी अपने आप मे मधुर व प्रिय है, जरूरी नही की हम बोले बस, छत्तीसगढ़ी में कलम भी चला सकते है, व छत्तीसगढ़ी को समृद्ध करने के लिए मनोरंजक बना सकते है। 

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"😊

रविवार, 13 सितंबर 2020

हिंदी एक भाषा ही नही परन्तु एक विचार है

हिंदी एक भाषा ही नही परंतु एक विचार है, जनमानस का क्रांति का साधन है। 


हिंदी हिन्द का धड़कन है यह सभी जानते है, वही अगर बात की जाये तो हिंदी का जन्म संस्कृत से हुआ है या यूं कहें हिंदी संस्कृत का एक रूप है, हिंदी हिंदू आर्य के शाब्दिक व्यवहार को प्रदर्शित करते थे जो जनमानस को आपस में जोड़कर रखती है, आज करोड़ो दिलों की मातृभाषा बन गई है, बचपन मे पहला शब्द हिंदी करोड़ो लोग सुनकर बड़े होते है । हिंदी एक न्याय प्रिय भाषा है वही मिठास से भरा हुआ पिटारा भी है।

आजादी की लड़ाई का जब जब जिक्र होगा, हिंदी कभी अछूता नही रहेगा, हिंदी का वैभव आज से नही या फिर आजादी की लड़ाई से नही आदिकाल से जनमानस की भाषा रही है। सभ्यता का उदय हुआ तब से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है, एकाएक कोई भाषा समृद्ध नही होती है, उसे प्रकृति, लोककला, लोकसंस्कृति, लोक जीवन, रहनसहन, व भाषा शैली आदि से भाषा बनती है। 

प्रकृति के मूलतत्व जीवन का हिस्सा होती है, हम प्रकृति से हँसना, बोलना, रोना, सोना, खाना, पीना व शान्ति आदि सीखते है। वही से भाषा या बोली का जन्म होता है, प्रकृति की चंचलता ही जीवन को अनमोल बनाती है, वैसे ही भाषा को काव्य, संस्कृति, रहनसहन, पहनावा, कला व खानपान आदि भाषा को रहस्यों की गुत्थी सुलझाती है। जीवन मे हम किस परिवेश में रहते है, देशकाल की सीमा, भूगोल, बोली व वेशभूषा बदल देती है साथ ही खानपान व संस्कृति। 

भाषा एक दिन में नही बनती है यह सच है, लेकिन एक के बोलने से या पढ़ने से भाषा जरूर समृद्ध होती है, हिंदी ममतामयी भाषा है, बोलचाल की भाषा मे प्यार व अपनापन का छाप झलकता है। सदियों लग जाती है भाषा का गहरा छाप छोड़ने में, आजादी के समय ही हिंदी भाषा ने मानव के चेतना को समृद्ध किया, परचे में कहानी, कविता, नाटक व एकांकी आदि लिखकर हिंदुस्तान की जनता को देश के प्रति जागरूक किये व स्वंतत्रता की लड़ाई में साथ देने लाखों लोग साथ खड़े हुए, भाषा का कमाल ही है जो भारत की जनमानस को एक कर पाई, साहित्य ने आजादी में एक बड़ी भूमिका निभाई है।

दुनिया में सात भाषा में वेब एड्रेस बनता है उसमें से एक हिंदी है, किताबी दुनिया से खत्म होकर हिंदी जुबान पर आ गई है साथ ही डिजिटल दुनिया में भी। हिंदी का दबदबा आज भी कायम है पहले  से अधिक लोग बोलने लगे है, क्योकि हिंदी भाषा संस्कृति व संस्कार की भाषा है, जो विकास का भुवन लिखते नजर आती है, राष्ट्र को एक बनाती है, गूगल ने भी हिंदी की महत्व को समझा व लिखने में आसान भी कर दिया।

1953 से 14सितंबर को हिंदी दिवस भारत मे मनाया जाता है, हिंदी केवल भाषा नही है अपितु जनमानस की अस्मिता, गौरव व स्वभिमान की भाषा है। हिंदी भारत की सीमा में कैद नही हुई विदेशों में भी आज पढ़ाई होने लगी है लोग बोलने लगे है। भारत भूमि को हिंदी बहुत सुंदर व समृद्ध बनाती है, विभिन्न बोली व भाषाओं वाले देश में एकता का परिचायक है। 


-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"

गुरुवार, 16 अप्रैल 2020

उदय और अस्त इंसान के हाथ में है

उदय और अस्त इंसान के हाथ में है

दुनिया के तमाम देश के डॉक्टर नावेल कोरोना वायरस के दवा या वैक्सीन बनाने में लगे हुए है, मानवीय सभ्यता का उदय के बाद यह एक पहली लड़ाई जो सभी देश अपने घर मे खुद से खुद लड़ रही है। सभ्यता का उदय और अस्त मानव के हाथ मे हमेशा से रहा है, उसके पीछे सारी दुनिया है। मानव ने विकास के अनेक परिभाषा दिये लेकिन सभी विकास की रूपरेखा अलग अलग है समय के साथ विकास में फेरबदल हुआ। 

आज सभी सम्पन्न, विकसित और विकासशील देश नावेल कोरोना वायरस से झुंझ रहा है, ज्यादातर देश हाथ खड़ा कर दिया है, विश्व महामारी में देश की सीमा देखना उचित नही होगा, इतिहास से हमे बहुत कुछ सीखने को मिला है ऐसे में इतिहास को साक्षी मनाकर हमे आज अपने घर को पहले देखने की जरूरत है, अगर हम सक्षम है तो दुनिया को रास्ता दिखा सकते है। सरकार के काम पर हस्तक्षेप न करते हुए उनके साथ खड़े होने की जरूरत है। 

विश्व मंदी कि ओर बढ़ रहा है वही महामारी ने लाखों लोगों की जान ले ली है वही मरीजो की संख्या कम होने के बजाए आय दिन बढ़ रही है। विश्व मंदी 1929 में अमेरिका के स्टॉक मार्केट क्राइसिस से शुरुआत हुई और उस समय मृत्युदर अवसाद से बढ़ी, विश्व आर्थिक मंदी का लंबे दौर तक रहा द्वितीय विश्व युद्ध के समय लाइन में आया। अवसाद से मृत्युदर बढ़ी, जीने के लिए आज लोगो को मेन्टल स्ट्रेंग्थ पर काम करने की जरूरत है, रोग प्रतिशोधक क्षमता बढ़ाये जाने से लड़ सकते है। धैर्य, साहस, सौम्यता, विज्ञान, एकजुटता, विज्ञान व अनुभव आदि से लड़ने की जरूरत है।

आज भारत की स्थिति USA और यूरोपीय देशों से बेहतर है, कोरोना ग्रोथ चार्ज कम हुई। हेल्थ इंस्ट्राफ्रैक्चर हमारी बेहतर है, कोरोना राइजिंग कर्व को नीचे लाने के लिए ट्रीटमेंट अच्छा हो, वायरस हमेशा से एक कदम आगे होता है, ऐसे में कोई भी देश पहले से तैयार नही होता है लेकिन भारत सभी चीजों से लड़ने के लिए तैयार खड़ा था इसी के बदौलत हम आज इतने दिन तक टिक पाये, कोरोना का कहर आग की तरह बरपा है जिसे निकलने में वक़्त लगेगा।

कम संसधान में युद्ध लड़ना आसान नही होता है लेकिन मुस्किल भी नही, वैचारिक दृष्टि से हमे आपस मे सामंजस्य स्थापित करने की जरूरत है, घरों में रहना आसान नही है लेकिन आज चैन को तोड़ने के लिए घरों में रहना और नियमित दिनचर्या में जीवनयापन करने की आवश्यकता है, इमरजेंसी होने पर ही घर से बाहर निकलना चाहिए नही तो जीतने समान है उसी में सर्वाइव करने की जरूरत है, हम जीवन के उस पड़ाव में है जहाँ मौत को हम खुद बुलाएंगे, ऐसे में कोरोना से लड़ने के लिए एक साथ खड़े होने की जरूरत है।

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

सुर्खियों के चक्कर मे तैर रही थी लाश : टाइटैनिक

सुर्खियों के चक्कर में तैर रही थी लाश : टाइटैनिक 

मानवीय सभ्यता का विकास का यह दौर इतिहास में हमेशा याद किया जायेगा, 1912 में जो घटना समुद्र में घटी उसके लिए किसी एक को दोष देने से अच्छा है सुर्खियों में रहने वाली जहाज को दोष देना उचित है। कभी न डूबने वाली इतिहास का भाप से चलने वाला उस वक़्त का सबसे बड़ा जहाज टाइटेनिक अपने पहली सफर साउथम्पटन से न्यूयॉर्क जाते वक्त ही जल के तल में समा गई। इतिहास का वह काला दिन सभी के जहन में आज भी जिंदा है। "समुद्र का दिल" हीरा समुंदर की लहरों में खो गई, विरासत में टाइटेनिक के मलबे के सिवाय कुछ मिला तो वह उस दिन प्रेस वालो को सुर्खियों का खजाना, प्रथम पृष्ठ में बड़े बड़े अक्षरों में कभी न डूबने वाली जहाज का भयानक अंत, खौपनाक मंजर जिसे दिल सुनकर कांप जाये। 20वी सदी की सबसे बड़ी समुद्री आपदा जिसे याद कर रूहे कांप जाती है, वह मंजर कभी देखने को न मिले। भाप से चलने वाली उस समय की सबसे बड़ी जहाज, कभी न डूबने वाली हमेशा सुर्खियों में रही, अपनी यात्रा 10 अप्रैल 1912 के चार दिन बाद 14 अप्रैल 1912 जल समाधि बन गई। बर्फ की चट्टान मिलने के बाद भी तेज रफ्तार से दौड़ रही थी, वक़्त रहते मोड़ने का अनुमान, एक कीर्तिमान स्थापित करने के लिए, एक बार मे समय के पहिया को समेटना चाहते थे, दूरियां को चंद घण्टे पहले तय करने की जिद्द 1517 निर्दोष को साथ मे लेकर टाइटैनिक डूब गई, इतिहास का सबसे बड़ी दुखद घटना में से एक है जब इतने लोग समुन्दर की लहरों में खो गये, किसी का ऐतेबार नही किया। रेडर भी काम नही आया और तो और उस जमाने के नामचीन इंजीनियर, एक्सपर्ट और डिज़ाइनर आदि की  कीमित देन अपनी पहली यात्रा के दौरान ही अपनी अंतिम यात्रा किया जिसका जिक्र हमेशा होगा, 4चिमनी प्रभावशाली रूप देने के लिए लगाए गए थे जिसमें तीन ही काम करता था। प्रेस के लिए सुर्खियों में हमेशा रही। 1500 लोग के साथ टाइटेनिक दफन हो गई, जब टाइटेनिक डूबी उस वक़्त 6 लोगो को बाद में सभी नावों को आपस मे जोड़कर रक्षा दल आई तब बचाये उस ठंडे पानी मे महज 20मिनट तैरना मुश्किल था पानी बहुत ज्यादा ठंडा था, बच पाना नामुमकिन था। नाव में 700 लोगो को सिर्फ इंतजार करना था, अपने मुक्ति के लिए जो उन्हें कभी न मिली, अपने आंखों के सामने समुन्दर में समाते हुए लोगो का दर्द दफन हो गई। टाइटैनिक कीमतें चीजों से बना था, उस जमाने के सारे विशेषज्ञों के राय एक जहाज बनाने के लिए जो जरूरत होता है उन्नत तकनीक का उपयोग किया गया था, वह सभी चीजें जरूरत के चीजे शामिल किया गया था। ये आपदा मानवीय संवेदना की याद हमेशा दिलाएगी, यह समुद्री आपदा ही नही बल्कि समय का चक्रव्यूह था जो काल बनकर आया था जो कभी न डूबने वाली टाइटेनिक को पहले सफर में ही ले डूबी। इतिहास में इसका जिक्र बहुत है लेकिन औरत के जज्बात समुन्दर की गहराई के सामने है, टाइटेनिक को समझना आसान नही है इसे महसूस कर सकते है, बहुत रिसर्च हुआ और होता रहा है इतिहास में इसे झुठलाया नही जा सका, समय के पहिया में टाइटेनिक हमेशा के लिए कैद हो गया है, हार्ट ऑफ ओसियन समुन्दर की लहरों में खो गई, हार्ट ऑफ ओसियन को पाने की इच्छा रखने वाले वैज्ञानिको ने बहुत खोज किया लेकिन रॉस महिला यात्री जिसके मंगेतर के जैकेट में होता है उनके हाथ लग जाता है वह अपने उम्र के अंत समय में एक रीसर्च के दौरान समुन्दर के लहरों में जहाँ टाइटेनिक डूबा रहता है वहाँ फेंक देती है समुद्र की लहरे उसे अपने आप मे आगोश लेती है। प्रेस के सुर्खियों में हमेशा के लिए छाप छोड़कर गया और इतिहास का भयानक आपदा मानवीय जीवन का एक मौत भरी रात रही थी समुन्दर की गहराई में सभी चीज समा गया। सुर्खियों में रहने वाला टाइटैनिक जीवन मे जहाजों का सफर का एक असवाल पैदा करने वाला पल रहा है, सभी विशेषज्ञों की विचारों को मात दे गई, एक गलती समय को कैद करने की विशाल जहाज को लेकर डूब गई। नौका दल कम थी लोगो को बचाना मुस्किल था कोई दूसरी जहाज घण्टो दूर थी ऐसे में जो बचे थे उनको मौत से कोई नही रोक सकती थी 6 लोग जो बचे वह ठंडे पानी मे टीके रहे जब नौका बचाव दल आई बाकी सभी लाश बनकर तैर रही थी, इतिहास को कैद करने वाला समय, विरासत में विशाल टाइटैनिक का मलबा और साथ मे बहुत से लोगो को अंत की कहानी के सिवाए कुछ नही मिला। 

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"

गुरुवार, 12 मार्च 2020

कोरोना से लड़ रहा है विश्व

कोरोना से लड़ रहा है विश्व


यह वायरस चीन के वूहान शहर से शुरु हुआ जो आज विश्व की समस्या बन गई। चीन हमेशा से सुर्खियों में रहना चाहता रहा है और समय समय पर रहता भी है, आज चमगादड़ के रस से दुनिया मे छा गया है। कोरोना वायरस सपने की तरह आया जो सभी को झकझोर दिया, यह आग की तरह फैला वही चीन में लगभग 5 करोड़ लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो गया है, यह आग की तरह फैल गया विकासशील देशों को तो छोड़ा नही वही विकसित देशों की सीमा भी लांघ गया। 


विकासशील देश मे सुमार चीन भूल गया क्या करना चाहिए क्या नही, अपने सपनो पर पानी फेर दिया। मौत के दरवाजे पर अबतक लगभग विश्व मे 90000 लोग खड़े है, वायरस जहर की तरह शरीर मे फैल गया, वही यह आंकड़ा दहलीज पर कर रहा है। लोग लड़ रहे है अपने स्वभिमान से, वायरस का फैलना अपने आप मे भयंकर मंजर है जो कभी किसी ने देखा था न देखा रहा है।


ईरान में मृत्यु दर बढ़ रही है वही चीन में तो मृत्यु दर तेजी से बढ़ी, मृत्युदर में देखा गया वृद्धावस्था में जो लोग है उनकी मृत्युदर देखा गया, युवा अवस्था मे इम्युनिटी अत्यधिक होती है जिसे प्रभावित कम हुई वही वृद्ध में कोरोना का कहर बरपा है, महिलाओं में यह कम है, तापमान का प्रभाव लोगो मे पड़ा और कोरोना करोड़ो लोगो को आग की तरह संकट में डाल दिया लाखो लोग इसे शिकार हुए वही भारत को भी छू लिया तकरीबन 50-60 लोग संदिग्ध पाये गये, कोरोना वायरस को  Covid19 दिया गया। मानवीय आपदाओं का वह मंजर है जो इतिहास में कभी नही हुआ था खूनी खेल लोग मौत के दरवाजे पर खड़े है, जीवन और मौत से लड़ रहे है।


इसे बचने के लिए सेनेटाइजर व मास्क का उपयोग करे। हाथ को साबुन या एल्कोहल से धोया, छीकते वक्त कपड़े का उपयोग करे, संक्रमित होने से बचे, निमोनिया होने पर प्राथमिक उपचार तुरंत ले और साथ ही अपने आप को किसी भी बीमारी से बचाकर रखे। मानवीय संवेदनाओं को ध्यान रखते हुए किसी की मौत न हो उसके लिए दुआ के सिवाये कुछ नही बचा है क्योंकि दुनिया मे कोरोना से बचने के उपाय अबतक ढूंढ नही पाये है ऐसे में अब भगवान से ही उम्मीद है कि वह सब अच्छा करे हम सिर्फ अपने आपको इम्यून कर सकते है हमारी इम्यून सिस्टम को मजबूत कर सकते है। आयुर्वेद के नियमों का पालन करके हम अपने आप को बचा सकते है, अपने इम्यून सिस्टम को बढ़ा सकते है। तुलसी, लौंग, अदरक तथा जड़ी बूटियां आदि का सेवन करे व हरे सब्जियों का उपयोग करे।


कोरोना वायरस सीधे लफ्जो में कहो तो समय से पहले मौत है, यह एक ऐसे समय मे आया जब विश्व विकास की नई परिभाषा और मौत को मात देने में लगी हुई है। मानव सभ्यता का विकास पर्यावरण पर अधिकार स्थापित करने के लिए हमेशा से रहा है जो आज संतुलन बनाये जाने की आवश्यकता है तब जाकर हम कोरोना जैसे वायरस से लड़ सकते है। वैसा काम ही न करे कि भयानक मंजर आये, लोगो को सामंजस्य स्थापित करने की जरूरत है, जहाँ कोरोना फैल रहा है वहाँ धैर्य की जरुरत है और अपने आप को संक्रमित होने से बचाने की, दुआ के सिवाये लोगो के पास कोई रास्ता नही है ऐसा मानना है, लोगो के जज्बात समन्दर की तरह गहरे है लेकिन आज कोरोना वायरस का भयानक मंजर देख पाना मुश्किल।।


-अमित चन्द्रवंशी "सुपा" 

बुधवार, 9 मई 2018

कश्मीर बदल रहा हैं

कश्मीर बदल रहा है

वो वादी जिसके पूरी दुनिया कायल है धरती में कोई जन्नत है तो वह सिर्फ कश्मीर है। कश्मीर की वादी बहुत मनमोहक है जो सभी को मन को भाँति है, यह भारत का एक ऐसा जगह है जहाँ सभी लोग घूमने जाने के ललायित होते है। धरती का स्वर्ग कहे जाना वाला कश्मीर दिन ब दिन बर्बाद हो रहा है, आखिर बर्बादी का राज क्या है यह सभी जानते है फिर भी मूक बने सब देख रहे है। अलगाववादी, नक्सलवादी तथा आतंकवादी आग की तरह बरप रहे है, सियासत की रोटी सेंकने में मशगूल है सभी आगे आने के नाम पर पीछे भाग रहे है, मसला तो वही है हल कहाँ है? दिन ब दिन हालात बतर हो रहा है, कभी पोलिश पर कभी CRPF के जवान कभी आर्मी ऑफिसर ऊपर पत्थराव हो रहा है लेकिन अब तो हद हो गई पर्यटक भी सुरक्षित नही है, एक ओर जहाँ हम सभी को कोश रहे है उधर दूसरी ओर रातोरात कश्मीर पंडित को खदेड़ दिए। सियासत की आंधी में सब झुलस कर रह गये, मौत के सौदागर आज भी जीवित है, कश्मीर का विलय रियासतों के एक करने में किया गया था जिसे सभी जगह का विकास हो सके लेकिन आज कश्मीर रोती बिलखती नजर आ रही है, मनमोहक वादी श्रीनगर का वह सुंदर दृश्य मन को मोह लेती है।

सत्ता चले जाये लेकिन देश का मान, इज्जत, विकास में बाधा नही आनी चाहिए, रोटी कपड़े और मकान सभी को चाहिए, कश्मीर में भी वही चाहिए लेकिन मौत के सौदागर सियासत की रोटियां सेंकने की काम क्यो कर रही है? आम जनता का हाल जनता तय करेगी सरकार नही, जवान की जो दशा कश्मीर में ही लानत है सियासत की कुर्सी में बैठने वाले पर, दोष देने के बाजये किसी को कोषने के बजाये काम करना चाहिए। अब सत्ता के लालची लोगों को उखड़ फेकने का समय है, वह वक़्त नही रहा की जुल्म होता रहे आवाज न उठाये, वो वक़्त नही रहा की शांत खड़े होकर देखते रहे अब एक्शन का वक़्त है कुछ भी करे तो पलटवार जवाब हमारे एक भाई शहीद होते है तो आतंकवादी और नक्सलवादी के हजार साथी को मार गिराना और बाधक को जड़ से मिटाना चाहिए।

देशभक्त हम एक बात से तय कर लेते है कि देश के साथ कौन कौन खड़ा है तो बात गलत है क्योंकि एक देशद्रोही भी कहता है कि मैं आजादी चाहिए , किस बात की आजादी आपस मे हम सबको लड़ाने के आजादी और देश को जरा जरा में बिखेर देने की आजादी। आजादी का सही मतलब हम आज कहि न कहि भूलते जा रहे है आकांक्षा मिश्रा जी को वो लाइन कानों गूंजता है "इतिहास में इतने रक्त बह चुके है कि अब देश बलिदान नही विकास मांग रही है।" खास ये बात सभी को समझ आ जाये तो देश में ये हाल नही होता और सियासत की रोटी नेता लोग भी न सेंक सके और शांतिपूर्ण तरीके से देश का विकास हो सके।

बुधवार, 23 अगस्त 2017

संस्मरण - वो नन्हे हाथ।

वो नन्हे हाथ..!!

अक्सर देखता हूं खिड़की के बहार तब एक ही चीज दिखाई देता है, वो नन्हे हाथ जो कलम पकड़ते वह कभी झंडा बेच रहा है, कभी किसी ठेले में बर्तन साफ करते नजर आते है; मन मे एक हलचल होता है, खास मेरे पैरों में जान होती और मैं अपने पैरों में खड़ा हो पाता तब कुछ न कुछ उनके लिए करता; आज नही तो कल सही एकदिन जरुरी कुछ करूँगा। दो वक्त का प्यार सभी को चाहिए होता है, प्यार का संचार तभी होगा जब हम अपना खुशी को न देखे दूसरे का मदत करे वास्तव में सच्ची खुशी होती है और जीत का रास्ता दिखाई देता है। एक वक्त की बात है, जब मैं भोरमदेव में शिव मन्दिर दर्शन के लिए गया हुआ था, तब वही एक बच्चे को होटल में काम करते देखा पहले तो मुझे बहुत बुरा लगा फिर मैं होटल मालिक से बोलूंगा सोचा पर मेरा जमीर वहाँ खो गया इस बात को लेकर की अभी पैरो में जान नही उड़ान की सोच रहा हु मैं तो कहता सही पर क्या मैं होटल मालिक की मानसिकता बदल पाता? इसतरह मैं वहाँ से उदास होकर चले गया फिर मुझे मेला में खिलौने लेना था लेकिन उसी वक़्त मैंने निर्णय लिया कि आज के बाद कभी कुछ भी खिलौने नही खरीदूंगा और फ़िजूल खर्चे नही करूँगा जिसे मुझे मायुस होना पड़े और मैं आज  कही जाता हूं तो सड़क किनारे उन गरीब आसाहय लोगो को देखते हु मेरे रोंगटे खड़े हो जाते है लेकिन मुझे उस वक़्त का तलाश है जिस वक्त मैं एक ऊंचे पायदान में चले जाऊंगा तब कुछ न कुछ जरूर करूँगा जिसे किसी के मन मे शांति ला सकू, ये काम नाम के लिए नही पंरतू मानवता के लिए करूँगा। अक्सर सुना करता हु मेरे दादा जी बहुत अच्छे नेक इंसान थे, हमारे गांव के आसपास गांव वाले दादा जी से परिचित थे और दादा जी ने जो कार्य किये वह बहुत सराहनीय था नामी आदमी थे, उनका कार्य सभी के लिए एक था कभी वो अपने आप को बड़ा आदमी नही समझे और उनसे जो कुछ भी बनता था वह मदद करते थे उनके विचार बहुत सुंदर थे मुझे भी याद आते है वह दिन जब मैं छोटा था तब दादा जी ने कहा था , बेटा पटाखे कम जलाया करो, इसे बहुत चीजे का नुकसान होता है, उस वक़्त में 5वी कक्षा में था और मैंने अंतिम बार पटाखे जलाए थे और उनके बातों में अमल किया और मैं हर दीपावली में कुछ पटाखे गरीब बच्चो को देता हूं ताकि मैं नही तो कम से कम वह जला ले और इसी में मैं शांति समझता हूं। नन्हे हाथो में जान तो बहुत होती है लेकिन गरीबी किसी के ऊपर सोच कर नही आती है, कुछ न कुछ उन नन्हे हाथों के लिए करना चाहिए जिसे उन्हें उचित शिक्षा, कपड़े, मकान, तथा भोजन मिल सके, अनाथ कोई नही होते है, समय का चक्रव्यूह ही उन्हें अनाथ बना देता है ऐसे में हमे हीनभाव से न देखे प्यार ,शांति तथा मानवता की नजर से देखना चाहिए, और समय समय पर गरीबो का मदत करना चाहिए।

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"
उम्र-18वर्ष 'विद्यार्थी'
रामनगर,कवर्धा,छत्तीसगढ़

संस्मरण- गंगरेल यात्रा वृतांत

संस्मरण- गंगरेल यात्रा वृतांत.10/08/2k17

कुर्मी अन्नदाता और भूमिपुत्र परिवार का मिलन समारोह गंगरेल में आयोजित हुआ था ,बहुत ने पहले से अपना नाम दिए थे कि हम आयेंगे हम आयेंगे करके और बहुत लोगो ने तो बिना बताये आये थे लेकिन व्यवस्था बहुत सुंदर था। मैं भी कुछ दिन पहले ही सोचा था जाऊंगा करके लेकिन मैं विकट स्थिति में था और एकदिन कतुलबोर्ड गया था घूमने तब डॉ. खिचरिया चाचा का क्लीनिक देखा तब मैं अंदर गया फिर उनसे बात किया और अपना परिचय दिया और उनसे पूछा की आप ही डॉ. खिचरिया चाचा है क्या? फिर उनसे बात हुआ फिर आयोजन के बारे में भी बात हुआ फिर हम लोगो को अपने घर ले गए थे बाड़ी भी देखे जिसमे अंजीर का पेड़ था जिसमे फल लगे हुए थे फिर घर अंदर गए एक माजा का डिब्बा पीने के लिए दिए जिसमे तोड़ा ही था तो चाचा बोले लड़ना मत पीलो आगे खरीद लेंगे, फिर चाचा ने रूम तक हम लोगो को कार से छोड़े। कुछ दिनो बाद पता चला प्रोग्राम का तिथि तब चाचा ने कहा कि नाम जोड़ना मत सबको आश्चर्य करना है फिर वह दिन 10अगस्त आ गया जिसका सभी को इंतजार था होता भी क्यो नही किसी अपने से मिलने में जो आनंद होता है वह कही और नही होता है, सुबह चाचा फोन किये की बेटा रायपुर नाका तक आ जाना वही हम लोग मिलेंगे फिर मैं वही स्टॉप में बैठा था मेरे बगल में थोड़े देर बाद सूरज बड़ी मम्मी आई और बैठी थी, मुझे पता नही था कि हम साथ जायेंगे क्योकि मैं सूरज बड़ी मम्मी से कभी मिला नही था फिर जब सत्यदेव चाचा नाका के पास  आये तब चन्द्रा चाची बुलाई कि बेटा अंदर आ जाओ फिर सत्यदेव चाचा, राकेश चाचा, चन्द्रा चाची, सूरज बड़ी मम्मी और मैं कार में बैठे थे फिर आगे की मंजिल की ओर रुख किये तब सत्यदेव चाचा हँसते है और बोले कि दोनों अगल बगल में बैठे थे फिर भी बात नही किये, हम सभी लोगो को हँसी आ गई। आर्टिग कार में जा रहे थे तभी बीच मे सुरज बड़ी मम्मी ने बड़ा बना के रखी थी सब लोगो मे थोड़ा थोड़ा खाये फिर थोड़े देर में चाची  हाथ मे चश्मा पकड़ी थी वो टूट गया फिर गुंडरदेही में चश्मा दूकान गए वहाँ उनका चश्मा नही बना उतने में गाड़ी खड़ी थी तो सूरज बड़ी मम्मी केला खरीद ली फिर हम लोग आगे निकले फिर थोड़े दूर गए थे उतने में दूसरे कार वाले ने हम लोगो को कुछ बोला लेकिन हम लोगो ने ध्यान नही दिया कांच बन्द था सुनाई नही दिया फिर दुबारा फिर बोले तब जान पहचान के होंगे करके बोली सूरज बड़ी मम्मी तब रुके तब उन्होंने जो बताये की पीछे का टायर पंचर हो गया है फिर सभी लोग उतरे फिर देखे कि हम लोगों ने तो थोड़ा दूर पंचर गाड़ी में सफर किये फिर चक्का बदले मैने भी थोड़ा मदत किया राकेश चाचा तो पूरा पसीने में डूब गए थे फिर हम लोग आगे की सफर तय किये और गुंडरदेही से धमतरी रास्ते मे एक अम्मा का होटल है जहाँ का बड़ा बहुत प्रसिद्ध है, वहाँ का बड़ा सत्यदेव चाचा लाये फिर हम सभी ने खाये फिर डॉ. चन्द्रा खिचरिया चाची काजू कतली मिठाई रखी थी खाने के लिए दी। गाड़ी चली अपने रफ्तार में हम लोग आखिरकार गंगरेल पहुच गये फिर रेस्ट हाउस में पता किये कोई नही थे फिर फोन काल किये किसी का फोन नही लग रहा था फिर रेस्ट हाउस के रसोईघर में कुछ लोग काम कर रहे थे, उनसे जाकर सुरज बड़ी मम्मी ने पूछी की ये बैस जी ने ही किराये से लिया है क्या करके? तब पता चला बाकी सभी लोग घूमने गए है फिर हम लोग सभी लोगो को ढूढ़ने लगे इसी दरम्यान सत्यदेव चाचा के साथ हम लोग बांध में रास्ते बने है और डैम के दूसरे ओर गार्डन के ओर जाता है उधर गए पर पता चला वहाँ कोई नही थे फिर हम लोग वापस आये फिर एक फोटोग्राफर से पूछे कि बहुत सारे लोग झुंड में है देखे है क्या फिर वो बताये पास में ही एक मन्दिर है वहाँ गए होंगे लेकिन वहाँ कोई नही थे सिर्फ वहाँ खिल्लु भैया और दीनू चाचा मिले फिर मन्दिर घूमे फिर वहां से वापस आये नया रिसोर्ट बन रहा है उसे बहार से ही देखे फिर वहां से वापस रेस्टहाउस आये फिर कुछ लोग मिले फिर तोड़े देर बाद सभी लोग आते गये घूम फिर के आ रहे थे सभी लोगो ने बहुत मस्ती किये थे। फिर धीरे धीरे  सभी लोग मिलते गए छत्रपाल चाचा, भगवती बड़ी मम्मी, ममता बुआ, ज्योति बुआ, गोविंद चाचा, हेमंत भैया, तारेंद्र चाचा और एक नयाब चाचा का नाम ही भूल गया था मनीष चाचा जी फिर गोविंद चाचा ने बहुत लोगो को अंडा पिलाये फिर सभी लोगो ने खाना खाये फिर हाल में बैठे फिर परिचय सत्र चला जिसमे भूमि पुत्र और कुर्मी अन्नदाता दोनों के सदस्य थे लेकिन बहुलता भूमिपुत्र की ज्यादे थे जिन लोगो का विचार अनुकरणीय था सत्यदेव चाचा का लगभग 150रिसर्चर पेपर निकल चुका है और एक कल्याण कॉलेज की प्रोफेसर आंटी जी का लगभग 60 रिसर्चर पेपर और सुधा वर्मा बड़ी मम्मी का 7पुस्तक प्रकाशित हो चुका है और देशबन्धु की मड़ई अंक की सम्पादिका है उनका ख़ुद का कॉलम पेपर में रहता है। बहुत लोग थे जिनका विचार एक मकसद एक दिशा तय करने के लिए था जो मेरे लिए सकारात्मक साबित होता है और मुझे प्रकृति में समय व्यतीत करना अच्छा लगता है इसलिए गंगरेल डैम भी बहुत मनोरम लगा फिर सुरज ढलने लगी शाम होने लगी और सभी लोग धीरे धीरे अपनी अपनी जगह स्थान कि ओर अग्रसर होने लगे।

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"
उम्र-18वर्ष 'विद्यार्थी'
रामनगर,कवर्धा, छत्तीसगढ़

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

सत्य की जीत

"सत्य के पथ पर कोई अपना नही होता है ; सत्य हमेशा जीवन का लाज रखता हैं।"

-अमित चन्द्रवंशी"सुपा"

असत्य पर सत्य की जीत दशहरा पर्व की हार्दिक बधाईयाँ!!

'त्याग जीवन का मुलमंत्र हैं , त्याग की भावना जीवन जीने का पुरुषर्था का गुणगान करता हैं ; नैतिकता लाभप्रद होता हैं , सत्य हमेशा विजयी होता हैं।'

"अमित सत्य सत्य अमित एक नाम हैं,
जीवन  में हमेशा सत्य की पहचान हैं ।"

जीत की कल्पना करने से बेहतर है कि आप कोशिश कीजिये और एक लक्ष्य तक अपना कार्य को अंजाम दे। सत्य आपके साथ हैं ,  तब आप डूबते हुए जहाज को भी बचा सकते हैं। घमण्ड इंसान को ले डुबता हैं और कही का नही छोड़ता हैं ; घमण्ड , दो उड़ते जहाज में एक-एक पैर रखने जैसा हैं तथा अहंकार इंसान को अधमरा करके छोड़ता हैं , घमण्ड का विनाश निश्चित हैं।

असत्य पर चलने वालो का हार निश्चित हैं क्योकि असत्य खराब पानी जहाज की तरह हैं जो कभी भी पानी में डुब सकता हैं और साथ में दुसरों को भी डुबो देता हैं। कभी भी जीतना हैं तो सत्य के साथ अपना रुख की दिशा नवीन कार्य कि ओर मोड़ ले तथा संघर्ष का विराम नही होने दे।

सत्य का बोध हमे स्वयं करना होता हैं , सत्य  जलते हुए दीप की तरह हैं जो कभी भी अंधेरा नही होने देता हैं ;  सत्य जीवन को फुलों की तरह से सुन्दर उपवन का निर्माण करता हैं जो हमेशा सुन्दर सुगन्धों से इंसान को महका देता हैं।

क्रोध, लोभ , पाप तथा हिंशा से कोषो दूर रहे तथा हमेशा जीवन में एक अच्छे कर्म अहिंशा से कीजिये जो आपका इतिहास बनेगा और आप इस उगते हुए दुनिया में अमर हो जायेंगे। सत्य को साथ हमेशा मिलता हैं और सच्चाई की जीत अंतिम घड़ी तक होता हैं।

-अमित चन्द्रवंशी"सुपा"
उम्र-17साल 'विद्यार्थी'
रामनगर,कवर्धा जिला-कबीरधाम
छत्तीसगढ़ मो.-8085686829

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015