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गुरुवार, 19 नवंबर 2020

सियासत की गलियारों में इंदिरा युग

सियासत की गलियारों में इंदिरा युग

इंदिरा गांधी ने वानर सेना का गठन किया था महज 13 वर्ष की उम्र में राजनीतिक गलियारे उस वक़्त होती नही थी न सोशल मीडिया व समाचारपत्र का जमाना था लेकिन उनके साथ इलाहाबाद में ही लगभग 5000 मेम्बर वानर सेना में थी। 

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान नैनी जेल का हवा भी लग गया था, बचपन से निडर व निर्भीक तो थी ही। जब देश का विभाजन हुआ तब दंगे व अराजकता के दौरान इंदिरा गांधी ने शरणार्थी शिविर को संगठित किया व पाकिस्तान से आये शरणार्थियों का देखभाल भी की। 

प्रधानमंत्री पद पर उन्होंने जो काम किया है वह हमेशा याद किया जायेगा। 1974 में अखिल भारतीय रेल हड़ताल थी, लेकिन उनकी सौम्यता कभी कम नही हुई, किसान भूमि सुधार से नाराज थे, उसके बाद 1975-1977 आपातकाल की स्थिति को आचार्य विनोबा भावे ने 'अनुशासन पर्व' कहकर स्वीकार किया था वही प्रसिद्ध पत्रकार खुशवंत सिंह ने आश्चर्यजनक रूप से स्वीकार किया था, बाद में हिंसा को देखते हुए खुशवंत ने इंदिरा सरकार पर प्रहार भी किया। 

1977 के चुनाव में इंदिरा हार गई, कांग्रेस में परिवर्तन तय था और वही हुआ। क्षेत्रिय हितों का जन्म वही से हुआ, आपातकाल नही होती तो क्षेत्रीय हित पर कोई ध्यान नही दे रहा था, हिंदी अंग्रेजी व प्रादेशिक भाषा लाया गया, जिसे त्रिभाषा कहा गया यह बहुत हद तक सार्थक सिद्ध हुआ। और राजनीति में कुर्सी वापस पाने के लिए समाजवादी विचारधारा को अपनाने का प्रयास किया। 

बैंक व अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण कर अर्थव्यवस्था को मजबूत किया। एमआरटीपी अधिनियम पारित किया, हम अक्सर काले दिन को याद करते है लेकिन इंदिरा गांधी के कार्यकाल को देखे तो सकारात्मक भी भरी पड़ी है। 

सोवियत संघ के साथ रिश्ते मजबूत हुए वही अमेरिका के साथ तनावपूर्ण, अमेरिकी राष्ट्रपति को लगता था कि इंदिरा झुक जायेगी, वही इंदिरा ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये, व बांग्लादेश का जन्म हुआ। परमाणु परीक्षण व 1971 में भारत  पाकिस्तान युद्ध में अमेरिका के सामने न  झुककर, विश्व के सामने भारत की छवि में सुधार की। 

सियासत में इंदिरा ने दूसरी बार सरकार में आई वही पंजाब अशान्ति व ऑपरेशन ब्लू स्टार ने इंदिरा को डस दिया। अमेरिका व कनाडा के राज्यों के तर्ज पर खालिस्तान मुक्त राज्य बनाने की मांग न मानते हुए वही हरमिंदर साहिब पर सैन्य कार्यवाही कर दी। 31 अक्टूबर 1984 की सुबह इंदिरा युग समाप्त हो गया।


-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"


रविवार, 13 सितंबर 2020

हिंदी एक भाषा ही नही परन्तु एक विचार है

हिंदी एक भाषा ही नही परंतु एक विचार है, जनमानस का क्रांति का साधन है। 


हिंदी हिन्द का धड़कन है यह सभी जानते है, वही अगर बात की जाये तो हिंदी का जन्म संस्कृत से हुआ है या यूं कहें हिंदी संस्कृत का एक रूप है, हिंदी हिंदू आर्य के शाब्दिक व्यवहार को प्रदर्शित करते थे जो जनमानस को आपस में जोड़कर रखती है, आज करोड़ो दिलों की मातृभाषा बन गई है, बचपन मे पहला शब्द हिंदी करोड़ो लोग सुनकर बड़े होते है । हिंदी एक न्याय प्रिय भाषा है वही मिठास से भरा हुआ पिटारा भी है।

आजादी की लड़ाई का जब जब जिक्र होगा, हिंदी कभी अछूता नही रहेगा, हिंदी का वैभव आज से नही या फिर आजादी की लड़ाई से नही आदिकाल से जनमानस की भाषा रही है। सभ्यता का उदय हुआ तब से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है, एकाएक कोई भाषा समृद्ध नही होती है, उसे प्रकृति, लोककला, लोकसंस्कृति, लोक जीवन, रहनसहन, व भाषा शैली आदि से भाषा बनती है। 

प्रकृति के मूलतत्व जीवन का हिस्सा होती है, हम प्रकृति से हँसना, बोलना, रोना, सोना, खाना, पीना व शान्ति आदि सीखते है। वही से भाषा या बोली का जन्म होता है, प्रकृति की चंचलता ही जीवन को अनमोल बनाती है, वैसे ही भाषा को काव्य, संस्कृति, रहनसहन, पहनावा, कला व खानपान आदि भाषा को रहस्यों की गुत्थी सुलझाती है। जीवन मे हम किस परिवेश में रहते है, देशकाल की सीमा, भूगोल, बोली व वेशभूषा बदल देती है साथ ही खानपान व संस्कृति। 

भाषा एक दिन में नही बनती है यह सच है, लेकिन एक के बोलने से या पढ़ने से भाषा जरूर समृद्ध होती है, हिंदी ममतामयी भाषा है, बोलचाल की भाषा मे प्यार व अपनापन का छाप झलकता है। सदियों लग जाती है भाषा का गहरा छाप छोड़ने में, आजादी के समय ही हिंदी भाषा ने मानव के चेतना को समृद्ध किया, परचे में कहानी, कविता, नाटक व एकांकी आदि लिखकर हिंदुस्तान की जनता को देश के प्रति जागरूक किये व स्वंतत्रता की लड़ाई में साथ देने लाखों लोग साथ खड़े हुए, भाषा का कमाल ही है जो भारत की जनमानस को एक कर पाई, साहित्य ने आजादी में एक बड़ी भूमिका निभाई है।

दुनिया में सात भाषा में वेब एड्रेस बनता है उसमें से एक हिंदी है, किताबी दुनिया से खत्म होकर हिंदी जुबान पर आ गई है साथ ही डिजिटल दुनिया में भी। हिंदी का दबदबा आज भी कायम है पहले  से अधिक लोग बोलने लगे है, क्योकि हिंदी भाषा संस्कृति व संस्कार की भाषा है, जो विकास का भुवन लिखते नजर आती है, राष्ट्र को एक बनाती है, गूगल ने भी हिंदी की महत्व को समझा व लिखने में आसान भी कर दिया।

1953 से 14सितंबर को हिंदी दिवस भारत मे मनाया जाता है, हिंदी केवल भाषा नही है अपितु जनमानस की अस्मिता, गौरव व स्वभिमान की भाषा है। हिंदी भारत की सीमा में कैद नही हुई विदेशों में भी आज पढ़ाई होने लगी है लोग बोलने लगे है। भारत भूमि को हिंदी बहुत सुंदर व समृद्ध बनाती है, विभिन्न बोली व भाषाओं वाले देश में एकता का परिचायक है। 


-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"