रविवार, 13 सितंबर 2020
हिंदी एक भाषा ही नही परन्तु एक विचार है
गुरुवार, 16 अप्रैल 2020
उदय और अस्त इंसान के हाथ में है
सोमवार, 13 अप्रैल 2020
सुर्खियों के चक्कर मे तैर रही थी लाश : टाइटैनिक
गुरुवार, 12 मार्च 2020
कोरोना से लड़ रहा है विश्व
मंगलवार, 6 अगस्त 2019
वकालत से राजनीति की गलियारों में सुषमा स्वराज जी
वकालत से राजनीति की गलियारों में सुषमा स्वराज जी
सुषमा स्वराज जी का निधन देश के लिए अपूर्ण क्षति है, पक्ष और विपक्ष की भूमिका सादगी से निभाई, भारतीय राजनीति के लिए अपूर्ण क्षति है जिसे हम कभी भर नही सकते। प्रखर वक्ता, महान नेत्री जी का जाना राजनीतिक गलियारों में वेदना का समय है। सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में वकालत करते, हरियाणा से विधायक 25वर्ष की उम्र में बना, फिर दिल्ली की प्रथम महिला मुख्यमंत्री बनकर, महिला सशक्तिकरण का उदाहरण पेश की। भारत की पहली महिला विदेश मंत्री बनी और पूरे विश्व मे भारत की एकता अखंडता का गुणगान किया। लोकसभा और राजसभा सांसद बनकर भारतीय राजनीति में सक्रिय रही, पक्ष और विपक्ष दोनों को भूमिका बखूबी निभाई, हमेशा धैर्य रखने की बात कहती, और विचारों में अमल करते हुए, सादगी से प्रश्न का जवाब देती थी। एक बार इन्होंने यह भी ट्वीट किया था कि यदि आप मंगल में भी फंसे है तो आपका मदद इंडियन एम्बेसी करेगी, सम्पूर्ण जीवन मे सरलतापूर्वक रही। 25 वर्ष की उम्र में कैबिनेट मंत्री हरियाणा के रूप में सेवा देते हुए विदेश मंत्री बने का सफर, विपक्ष में रहते हुए दिलेर इंसान बना, पक्ष में जब एक लोकसभा में भाषण दे रही थी तक आरोप प्रत्यारोप लगे तब सुषमा जी ने साफ कहा अपने साथियों को आप लोग साथ रहे मैं इनसे (विपक्षी) से निपट लुंगी, वास्तव में एक दृण इच्छा शक्ति उनमें थी, साफ राजनीति, सीधी सरल रूप में थी। सुषमा जी का अलग अलग शैली में भाषण हमेशा याद आएगी। यूनाइटेड नेशंस में जलवायु परिवर्तन पर विचार रखी और विदेश नीति में बहुत अच्छा काम किया, सुषमा जी का विदेश निति देखते हुये बनता था, नेपाल में आपदा आई तो सबसे पहले भारत पहुँचा यह सुषमा जी की सादगी थी, इंडोनेशिया की मदद के लिए यूनाइटेड नेशंस में ही बात रखी थी। इस लोक से सुषमा जी का पलायन कर जाना हमेशा खलेगी, नमन है ऐसी मातृ शक्ति को जो हमेशा देश के बारे में सोचती रही।
-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"
शनिवार, 3 अगस्त 2019
दोस्ती की दोस्ताना
दोस्ती की दोस्ताना
उम्र के हर पड़ाव में एक साथी की जरूरत पड़ती है, वह किसी भी रूप में हो सकता है बचपन मे माँ दोस्त का रूप लेती है और खाने से लेकर सब काम करती है। दोस्ती का दूसरा रूप जो उँगली पकड़कर चलना सिखाते है दुनिया से रूबरू कराते है वह पिता होता है, उम्र के हर दहलीज पर कोई न कोई एक इंसान होता है जो दोस्त जैसा होता है और हर उम्र में हर मोड़ में हमारा साथ देते है। बचपन मे दोस्त बहुत होते है जिनके साथ हमारी खट्टी मीठी यादे होती है, बचपन मे साथ बिताये पल वह अनोखी यादे होती है जो जहन में हमेशा होती है, साथ खेलते है, रोते हँसते समय बीत जाता है, बड़े होते है तब वह बचपन याद आता है। समय के सागर में विश्व में हम अलग अलग समय मे अलग अलग विचार वाले लोगो से मिलते है, जीवन मे अनेक अनुभव मिलते है जो सदा सुख के हित में होता है। सात्विक जीवन ऊंच विचार दोस्ती की याद दिलाती है, दोस्ती एक रिश्ता ही तो है जो विश्वास के नींव में टिकी हुई होती है, उम्र जैसे जैसे बढ़ती है हम एक नया अध्याय लिखते है जो विचारों का आदान प्रदान से होती है, समय के साथ विचारों में बदलाव आती है, विचार से रिश्ता मजबूत होता है। एक प्रेमी के लिए प्रेयसी का प्रेम का महत्व होता है वह दोस्त के तरह सादगी से जीवन निर्वाह करता है। एक माता के लिये सन्तान और उसका पति ही दोस्त होता है, जो सुख दुख का साथी होता है। एक पत्नी के लिए उसके पति से अच्छा कोई दोस्त नही हो सकता है, सभी को किसी न किसी उम्र में दोस्त की आवश्यकता होती है वह विभिन्न रूप में मिलते है। एक बेटी किसी की माँ, बहन, पत्नी और पुत्री होती है उसी तरह एक बेटा किसी का पुत्र, पिता, पति और भाई होता है, इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए वह जीवन के सभी कर्तव्यों को ध्यान में रखता है और अपना परिचय एक दोस्त के रूप में देता है और दुनिया में अपनी दोस्ती का दोस्ताना सुनाती है। बुजुर्ग होने पर एक पिता व एक माँ का दोस्त बेटा और बहु बन जाते है, यही तो दोस्ती की सार है जो हर हाल में हमे जीना सिखाती है।दोस्त की तुलना हम किसी से नही कर सकते है वह जिस भी हाल में हो हमेशा सुख चाहता रहता है जीवन मे अलग अलग रास्ते से गुजरना पड़ता है सत्य के लिए हमेशा अड़िग होना पड़ता है, सत्य के आधार पर दोस्ती चलती है।
-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"
साइंस कॉलेज दुर्ग
बुधवार, 26 जून 2019
पौनी पसारी
पौनी पसारी जाति का महत्व
पौनी पसारी जाति का महत्व छत्तीसगढ़ समाज मे जितना है उतना ही उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, झारखंड,बिहार, राजस्थान तथा महाराष्ट्र में भी है। पहले इनका निर्धारण अक्षय तृतीया जिसदिन गांव बनता है उसी दिन निर्धारित जो जाता था और दान पानी( फसल) मेहनतान कितना देना है सभी का रुपारेखा तय हो जाती थी। पौनी पसारी जाति देखते देखते आधुनिक जीवन मे बिखर रहे या कहे अब कोई काम करना नही चाहते। ग्वाला,नाई, धोबी, लोहार, मोची, बइगा व कुम्हार आदि पौनी पसारी जाति में आते है इनका महत्व प्राचीन इतिहास में बहुत था आज भी गांव में निहित है।जब भी कुछ होता है गाँव के मुखिया या दाऊ या गांव का गौटिया या जमींदार आदि के घर तब पानी ग्वालिन भरती है और घर का सम्पूर्ण काम करती है, ग्वाला गाय को चराने के लिये लेकर जाता है और दूध दुहता है।मृत्यु हो जाती है किसी का तब घर हिन्दू रीतिरिवाज से अशुद्ध हो जाता है तब ग्वालिन काम करती है। दीपावली त्यौहार में गोवर्धन पुजा का बहुत महत्व है गोवर्धन के ऊपर चलने के बाद गाय की पूजा की जाती है फिर उसके बाद खिचड़ी खिलाने का कार्य करते है, फिर मोर पंख लगाते हैं ग्वाला 1-2 खाड़ी में लगता था पहले, अब पैसा भी देना पड़ता है। समय बीत मांग बढ़ रहा है आधुनिक जीवन मे जरूरत पढ़ते जा रही है आज के समय में कुछ पीढ़ी दर पीढ़ी काम करना पसंद नहीं करते हैं सभी लोगों को अपने आसपास बदलाव देखने को मिल रहा है टाइम कम ही देखने को मिल रहा है शहर में नाई बड़ी-बड़ी दुकानों में सलून खोल डाले हैं पहले किसान को खोजते बाड़ी खेत बगीचा जहां भी देखते हैं उनका दाढ़ी और मूंछ बनाते हैं।पूजा हवन आदि के लिए आम की लकड़ी, दूबी फुल पान का जुगाड़ नाई करता था नाई दोना पतली बनाता था जिसे विवाह में विवाह दशगात्र कार्यक्रम उपयोग में लाया जाता था बदलते समय में यह सब मशीन द्वारा बनता है। धोबी का काम है कपड़े धोने का किसी की मृत्यु हो जाती है तब पूरे घर का कपड़ा धोने की जिम्मेदारी धोबी की होती है और घर का शुद्धिकरण की काम करता है। पहले सुहाग देने की परंपरा थी जिसे धोबी निर्वाह करता था अब यह बंद हो चुकी है। मोची जुता बनाने का काम करता है जूता बनाने का कार्य करता है कोर्रा चमड़ा का समान, बेल्ट ,चप्पल जूता पर्स बनाने का काम करता है। कुम्हार दिवाली त्यौहार में दी और मटका दीपी देने आते हैं अक्षय तृतीया में चुकिया और मटका पानी भर के बगीचे में और पीपल के पेड़ के नीचे रखे जाते हैं।कुमार के पास बहुत सी कला होती है घोड़ा गाड़ी बच्चे लोगों खेलने के लिए बनाते हैं पुतला पुतली बनाते हैं। लोहार अपने कार्य में महारत हासिल किया हुआ है सभी प्रकार के और बहुत सारे औजार बनाने आते हैं जैसे रापा कहती गैती, सबल आदि पर खेती करने के किस्म किस्म के औजार बनाते हैं लेकिन यह सभी खत्म हो रहे है जब से जब से ट्रैक्टर हार्वेस्टर आया है तब से खत्म होती जा रही है धंधा चोपट सी हो गई है धीरे-धीरे काम खत्म होते जा रहे हैं बैगा का काम होता है देव देवालय माहमाया में पूजा-पाठ काम करने का जो जवारा जोत जलाने का काम करते हैं आधुनिक आधुनिक शहर में आज यह खत्म हो रहा है। बदलरे वक्त में आज रहते हैं सभी चीजें भूलते जा रहे हैं बदलाव के जीवन में हम अनिरीक्षित बदलते देख रहे हैं मशीन इस दुनिया में सभी चीजों के साथ मुश्किल है आज की पीढ़ी को दिखाने के लिए म्यूजियम बनाने की आवश्यकता है बदलते वक्त में संस्कृति को संजोकर रखने के लिए अपनी संस्कृति को आधुनिक जीवन में साथ साथ लेकर चलने की जरूरत है समाज को एक दूसरे के साथ जोड़कर रहने की जरूरत है।
-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"