शनिवार, 28 नवंबर 2020

भाषायी पुर्नगठन पर छत्तीसगढ़ी

स्वतंत्रता के पूर्व भारतीय राज्य क्षेत्र में बंटा हुआ था ब्रिटिश भारत व देशी रियासतों। छत्तीसगढ़ विंध्याचल में आता था उस वक़्त, वर्तमान मध्यप्रदेश, अब वास्तविक स्वरूप में छत्तीसगढ़। छत्तीसगढ़ की बात कि जाए तो हम भाषायी रूप से अलग नही विकास के नाम पर बस्तर व सरगुजा को ध्यान में रखते हुए विविधता से भरा हुआ छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश से अलग हुआ। 

छत्तीसगढ़ के हिस्से में अनेक बोलियां व राजभाषा छत्तीसगढ़ी मिला जो हमारे लिए एक तौफा है, क्योंकि कुछ राज्यों की अपनी भाषा ही नही है, सिर्फ बोली है। छत्तीसगढ़ी व हिंदी देवनागरी लिपि में पढ़ी व बोली जाती है, और त्रिभाषायी हिंदी, अंग्रेजी व क्षेत्रीय भाषा का महत्व अपनी राजभाषा से समझ आती है। 

हमारी राजभाषा छत्तीसगढ़ी है, भले ही राजभाषा में जुड़ा न हो या आठवीं अनुसूची में शामिल न किया गया हो, फिर भी विधायिक छत्तीसगढ़ी का चुनाव करती है। छत्तीसगढ़ी से बस छत्तीसगढ़ अलग हो नही सकता था क्योंकि हल्बी, सरगुजिया व गोंडी भी हमारी अपनी है, ऐसे में छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी पर आज जोर दिया जा रहा है। 

छत्तीसगढ़ी की शब्दकोश बहुत पहले बन चुका था तकरीबन 1890 के दशक में, बाद में साहित्य पर ध्यान नही दिया गया व बोलचाल में थोड़ा परिवर्तन के कारण छत्तीसगढ़ी समृद्ध नही हुई जितना होना चाहिए, लेकिन आज साहित्य भी भरपूर मात्रा में, छत्तीसगढ़ी अनुवाद भी बहुत से है, कला परम्परा में साफ झलकता है, फ़िल्म में भी कमी नही, प्रशासनिक गलियारे भी अब पीछे नही है। 

छत्तीसगढ़ी का जन्म कब व कैसे हुआ इसका किसी को शायद जानकारी नही है, फिर भी कहा जाता है संस्कृत से हिंदी का जन्म हुआ और 10वी शताब्दी में हिंदी से छत्तीसगढ़ी, इसमें कोई दो मत नही है, छत्तीसगढ़ी आज अपने आप मे समृद्ध व शक्तिशाली है। 

अनुच्छेद 345 में छत्तीसगढ़ी को क्षेत्रीय भाषा का दर्जा है, छत्तीसगढ़ी अपने आप मे मधुर व प्रिय है, जरूरी नही की हम बोले बस, छत्तीसगढ़ी में कलम भी चला सकते है, व छत्तीसगढ़ी को समृद्ध करने के लिए मनोरंजक बना सकते है। 

-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"😊

गुरुवार, 19 नवंबर 2020

सियासत की गलियारों में इंदिरा युग

सियासत की गलियारों में इंदिरा युग

इंदिरा गांधी ने वानर सेना का गठन किया था महज 13 वर्ष की उम्र में राजनीतिक गलियारे उस वक़्त होती नही थी न सोशल मीडिया व समाचारपत्र का जमाना था लेकिन उनके साथ इलाहाबाद में ही लगभग 5000 मेम्बर वानर सेना में थी। 

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान नैनी जेल का हवा भी लग गया था, बचपन से निडर व निर्भीक तो थी ही। जब देश का विभाजन हुआ तब दंगे व अराजकता के दौरान इंदिरा गांधी ने शरणार्थी शिविर को संगठित किया व पाकिस्तान से आये शरणार्थियों का देखभाल भी की। 

प्रधानमंत्री पद पर उन्होंने जो काम किया है वह हमेशा याद किया जायेगा। 1974 में अखिल भारतीय रेल हड़ताल थी, लेकिन उनकी सौम्यता कभी कम नही हुई, किसान भूमि सुधार से नाराज थे, उसके बाद 1975-1977 आपातकाल की स्थिति को आचार्य विनोबा भावे ने 'अनुशासन पर्व' कहकर स्वीकार किया था वही प्रसिद्ध पत्रकार खुशवंत सिंह ने आश्चर्यजनक रूप से स्वीकार किया था, बाद में हिंसा को देखते हुए खुशवंत ने इंदिरा सरकार पर प्रहार भी किया। 

1977 के चुनाव में इंदिरा हार गई, कांग्रेस में परिवर्तन तय था और वही हुआ। क्षेत्रिय हितों का जन्म वही से हुआ, आपातकाल नही होती तो क्षेत्रीय हित पर कोई ध्यान नही दे रहा था, हिंदी अंग्रेजी व प्रादेशिक भाषा लाया गया, जिसे त्रिभाषा कहा गया यह बहुत हद तक सार्थक सिद्ध हुआ। और राजनीति में कुर्सी वापस पाने के लिए समाजवादी विचारधारा को अपनाने का प्रयास किया। 

बैंक व अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों का राष्ट्रीयकरण कर अर्थव्यवस्था को मजबूत किया। एमआरटीपी अधिनियम पारित किया, हम अक्सर काले दिन को याद करते है लेकिन इंदिरा गांधी के कार्यकाल को देखे तो सकारात्मक भी भरी पड़ी है। 

सोवियत संघ के साथ रिश्ते मजबूत हुए वही अमेरिका के साथ तनावपूर्ण, अमेरिकी राष्ट्रपति को लगता था कि इंदिरा झुक जायेगी, वही इंदिरा ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिये, व बांग्लादेश का जन्म हुआ। परमाणु परीक्षण व 1971 में भारत  पाकिस्तान युद्ध में अमेरिका के सामने न  झुककर, विश्व के सामने भारत की छवि में सुधार की। 

सियासत में इंदिरा ने दूसरी बार सरकार में आई वही पंजाब अशान्ति व ऑपरेशन ब्लू स्टार ने इंदिरा को डस दिया। अमेरिका व कनाडा के राज्यों के तर्ज पर खालिस्तान मुक्त राज्य बनाने की मांग न मानते हुए वही हरमिंदर साहिब पर सैन्य कार्यवाही कर दी। 31 अक्टूबर 1984 की सुबह इंदिरा युग समाप्त हो गया।


-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"


शुक्रवार, 6 नवंबर 2020

पर्व को लेकर लोगों का दो मत होना

पर्व को लेकर लोगों का दो मत होना.

आजकल लोग पर्व को लेकर काफी उलझन में रहते है यह पर्व हमारा है वह पर्व हमारे परम्परा में नहीं है, वास्तव में पर्व को इंसानो ने अपने सहूलियत के साथ अपनाये व परम्परा में तब्दील हो गई। भारतीय संस्कृति में अभी पर्व नवदुर्गा से शुरुआत होकर तुलसी पूजा में जाकर रुकेगी। 

मैंने कुछ लोगों का विचार पढ़ा कह रहे है हमारे यहाँ का पर्व करवाचौथ नही है, मैं भी मानता हूं हमारा नही है पर जो मना रहे है व अपने दायरे में रह कर मना रहे है ऐसे में हमें आपत्ति नही होनी चाहिए, क्योंकि चांद तो किसी का नही है वो तो सनातन का है अर्थात जब से ब्रम्हांड का उदय हुआ है तब से चाँद हमारे लिए मूल्यवान है, ऐसे में करवाचौथ के पूजन से क्या छत्तीसगढ़ के सकट पर प्रश्न या संकट खड़ा हो जायेगा ?  तो नहीं, दोनों भारतीय संस्कृति का परम्परिक क्षेत्रीय पर्व है, जो भारतीय संस्कृति को प्रकट करती है न कि किसी को नीचा दिखाने का। 

छत्तीसगढ़ में दुर्गा पूजा में जसगीत का अनोखा महत्व है, इसके शुरुआत से आप समझ जाइये कि त्योहारों का मौसम आने वाला है, एक लेखक ने ठंडा का जिक्र किया था कि जैसे ही ठंड की महसूस होती है भारतीय संस्कृति का पर्व साफ नजर आने लगती है। जब कहि डांडिया-गरबा होता है तब कुछ लोगो का कमेंट घिनौनी होती है, अरे आपको कौन अधिकार दिया है किसे गरबा नृत्य करना चाहिए किसे नही, माता की आराधना करने में कोई बुराई नही होना चाहिए, गरबा गुजरात से आया है इसका मतलब यह नही की हम गरबा का अपमान कर दें, गरबा भारतीय संस्कृति का हिस्सा है मना नही सकते तो अपमान भी न करे। 

छत्तीसगढ़ में कार्तिक मास में सुबह-सुबह पूरे कार्तिक महीने में पानी मे डुबकी लगाकर, दीपदान करने का रिवाज है जिसमें दिये सूखे कदु या लौकी के होते है इसे आस्था कहे या भारतीय संस्कृति का हिस्सा यह हमारे लिए अनमोल है। वही सुआ नृत्य की परम्परा है, दिवाली के शुरुआत में सुआ नृत्य करना अर्थात स्त्री शाम में घर-घर जाकर सुआ अर्थात तोता के चारों तरफ नृत्य करती है और सुआ गीत गाकर स्त्री अपने प्रेम को प्रकट करती है। 

वही बिहार में छठ पूजा का महत्व बेहद है तो इसे हमें कोई तकलीफ नही होनी चाहिए, वे लोग हम सब पर अपनी परम्परा नही थोप रहे है, हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए, भारतीय संस्कृति विविधता में एकता का सन्देश देता है, और खण्ड खण्ड से मिलकर बना देश है ऐसे में दूसरों की संस्कृति को बुरा कहने से बचे कोई राय बनाने से बचे आस्था का पर्व प्रेम पूर्वक मनाये, अपनी अपनी संस्कृति है जिसे हम जिंदा रखने का प्रयास कर रहे है, स्वतंत्र भारत मे भारतीय संस्कृति का आदर भाव करिये।।

~अमित चन्द्रवंशी "सुपा"