यह आक्रोश अन्नदाता का है, सरकार को अन्नदाता की बात सुनी चाहिए...
किसान आंदोलन सरकार के किसान बिल के विरुद्ध है, लेकिन सरकार अबतक बिल को समझाने में नाकाम क्यों रही? इस पर विचार विमर्श करने की जरूरत है, आखिर आज इतनी बड़ी संख्या में किसान दिल्ली में क्यो आकर बैठ गई क्या सरकार विज्ञापन के माध्यम किसान बिल को समझा नही पाया या किसान समझने की कोशिश ही नही किये ये दोनों अलग मुद्दे नही, किसान बिल से जुड़े हुए है।
1857 में बगावत का दौर था या कहे कम्पनी शासन के प्रति आक्रोष, प्रथम स्वंतत्रता संग्राम के समय भारतीय जनमानस भुखमरी से जुंझ रहा था वही किसानी भूमि हस्तांतरण हो रहा था एक ओर निम्न किसान व मजदूरों की हालात दयनीय थी वही विद्रोह का सूत्रपात हुआ, बाहरी घटनाओं का भी प्रभाव पड़ा।
आजादी के बाद 1967 में भारत भुखमरी से गुजर रहा था, तब पश्चिमी गुट के भरोसे भारत था, और उस वक़्त अमेरिका गेंहू देने से मना कर दिया तब भारत के किसान ने हार नही मानी और अथक प्रयास व परिश्रम से आज हम खाद्यपदार्थ पर स्वयं के पैरों पर खड़े है। किसान कभी भी खेती नही कर सकता है क्योंकि कभी मानसून के न आने का दुःख किसान से अच्छा कोई नही समझ सकता है। 1987 में भीषण आकाल ने लोगों को क्रोधित कर दिया वही, किसान संघठन एकजुट हुए और उनकी मांग थी कृषि उपज के लिये ऊंची कीमत व सब्सिडी मिले, यह मांग वास्तव में जायज थी, आज भी उचित मूल्य पर ही बात हो रही है और मांगे जायज है।
किसान दिनरात मेहनत करते है, लेकिन कभी मानसून का मार कभी बिजली आपूर्ति के चलते फसल बर्बाद हो जाता है, और ऐसे वक्त में किसान का दुःख कोई नही समझता है। आज किसान दिल्ली में धरना दे रहा है, क्योंकि किसान नाराज है, और लोकतांत्रिक देश मे यह आम बात है जनता द्वारा चुना गया सरकार जनता की बात नही सुनेगा तो कौन सुनेगा? प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रश्न खड़ा हो रहा है, क्या प्रेस किसान बिल को नही समझा पा रहा है या सरकार का बिल गलत है? यह दोनों मुद्दे आज गम्भीर है। किसानों के ऊपर आश्रु गैस छोड़ना है या पानी का कैन डालना गलत है शांति से अपनी बात सरकार को रख रहे है ऐसे में किसान अपराधी कब से हो गए? यह दूसरे आंदोलन की तरह पेट की बात है साहब, विचार मंथन व एक दूसरे से बात करने पर समस्या का हल होगा।
किसान आंदोलन में राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगी हुई है यह सभी आंदोलन में होता रहा है कोई नई बात नही है, लेकिन वही जब इंदिरा को ठोके है मोदी क्या चीज है, यह बहुत ही घटिया है, अशोभनीय है, खालिस्तानी विचारधारा जरनैल सिंह भिंडरावाले का फोटो लेकर आंदोलन में आना बहुत ही निंदनीय है, इसे मुद्दे पर यह भार कम पड़ेगा, इस तरह से पूरे किसानो समुदाय को खालिस्तान व पाकिस्तानी सोच कहना बहुत ही अशोभनीय है।
किसानों की बात सरकार को सुनाना चाहिए, जितना जल्दी हो एक दूसरे के समझ व सोच बुझ के हिसाब से सरकार व किसानों का आपसी सहमति से काम करने का समय है। किसानों का हक मिलना चाहिए, और msp को कानूनी मंजूरी देते हुए, किसानों का पूरी अनाज सरकार को उचित मूल्य में लेना चाहिए।
-अमित चन्द्रवंशी "सुपा"