दी तू उड़ चली पीयूष के साथ
हाँ याद रखना बबूल को
सोने की चिरैया तू उड़ चली
माँ पापा को याद रखना
तेरी डोली चल पड़ी है
तू रुकना नही किसी मोड़ में
सुख दुख में साथ देना
हर बात प्यार से कहना
जैसे मुझे बताती है
वैसे ही सभी को समझना
तू समझ जाना उस घर को
मायके याद आये तो
उस घर के माँ पापा से बात करना
सोने चिरैया उड़ चली
बबूल को छोड़
याद रखना अपना कर्तव्य
सदा प्रेमभाव रखना
इस भाई को याद रखना
वो पहली राखी भूला नही सकता
वो उपमा का स्वाद भुला नही सकता
सोने चिरैया उड़ चली
बबूल को छोड़
याद रखना सबको।
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